आज सोनभद्र का सुदूर आदिवासी अंचल के भ्रमण किया।चुनाव के बाबत इन मूल निवासियों से विचार जानने की कोशिश की। उत्तर भी वही था जिसका मुझे उम्मीद था। ये आदिवासी राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा नही है,इन्हें सबसे महत्त्वपूर्ण अपनी जीवन से जुड़ी समस्या है। इस अंचल में विकास तो हुआ है काया पलट की तरह, इस विकास मे तीनो सरकार का योगदान है,अब ये सामान्य जिंदगी जीना चाहते है, भौतिक साधनों के साथ, ये भी नेता बनना चाहते है,इनके बच्चों को भी अधिकारी बनना है। इसलिए ये अपने समाज के नेता को ढूढते है। उन्ही की दिखाए रास्ते पर चलना चाहते है। और चुनाव पर गजब का चुप्पी बनाये हुए है,वो इस इंतज़ार में है कि मेरा नेता ,मेरे समाज का नेता मुझे भरोसा दिलाये।कोई भी दल ये दावा नही कर सकता कि आदिवासी का मत किसी एक पक्ष को ही मिलेगा। यह उनके स्थानीय और समाज के नेता पर निर्भर है। उनके लिए सभी दल एक जैसे ही है। हाँ मोदी का नाम खूब सुन रखा है ,ये दें इनकी हाथों में चिपका मोबाइल का है। लेकिन वोट इन्ही को दें जरूरी नही। नई पीढ़ी में गजब का उत्साह है, उन्हें तो मोबाइल वाला नेता ही पसंद है लेकिन बुजुर्गो को अपने जैसा कोई अपना नेता चाहिए ,उनकी आंखें ऐसे को ही अब भी ढूंढ रहा है। वे बताते है कि आज के लड़के (युवा नेता) न जाने क्या क्या समझा जाते है लेकिन कोई नही कहता कि कल तुम्हारा वृद्धा पेंशन चालू करवा देंगे।
लगभग 15 गांवों के घुमंतू में ये निष्कर्ष पर पहुंचा कि इन्हें अपना यानी अपने समाज के नेता की तलाश है जिसे ये अपनी बात बिना किसी भय या संकोच के कह सके।
©नितेश भारद्वाज
गुरुवार, 16 मई 2019
चुनाव में आदिवासियों की उम्मीद
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