बुधवार, 14 अगस्त 2019

वो आखिरी सावन

यही तो महीना था सावन का
जब आखिरी बार निहार पाया था उसे
सहेलियों संग बारिश में भींग कर
खुले आसमान में
उस ट्रेन का इंतज़ार कर रही थी
जो मुझे लेकर जा रहा था
लंबी से ट्रेन में एक झलक पाने को
सावन की बूंदों में आंसुओ की धार
बहा रही थी वो
जैसे ही गुजरा था उसकी निगाहों से मैं
उछल कर खूब हाथ हिलाई थी
फिर दोनों हथेलियों से मुंह ढक कर
खूब हिचकोले ली थी
तब तक ओझल हो गया था मैं
दूर बहुत दूर चला जा रहा था मैं
न जाने कैसे सम्भलकर गयी होगी वो
घर की चौखट तक
कितनी लड़खड़ाई होगी वो
कुछ नही था दूरियों के बीच
न खत न तार
न कोई सूत्रधार
आज की तरह न फोन न फेसबुक
बस एक वादा , एक भरोसा
जो उस पानी मे ही बह गया था
हाँ बचाकर रखा था एक हिचकी
जो प्रति दिन नियत समय पर
आ रहा था
यह समय भी उसीने निर्धारित की थी
शायद उसी ने मिटा दी
जाने क्यूँ वो हिचकियाँ अब नही आती
परन्तु उसकी चंद लम्हो में सदियों की बातें
आज भी तैरती है गेसुओं की खुशबू
और बिन रस्मो रिवाज की यादें।
आज भी वजूद में है वो मासूम सी
अधखुली सी अधर ,चंचल आंखों वाली
तस्वीर..........और वो दो पंक्ति की खत
©nitesh

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