मैंने अभाव को भी देखा है
धन की बहाव को भी देखा है
सुकूँ इस मे भी नही
सुकूँ उस मे भी नहीं
भूख से बिलखते बच्चे
एक खुराक दवा की जरूरतें
फटेहाली में पत्नी का तंज
ढकने को बेटियों का तन
परेशान सा
उस इंसान को भी देखा है
नोटो की गड्डियों की ढेर
रिश्वत काली कमाई वाली
अफसर
जमाखोरी ,नोटो की बिस्तर वाले
फर्जी बनिया,पत्रकार,दलाल
डॉक्टर
सबकी माथे पर
एक चिंता की लकीर देखा है
इनकी बच्चो की भूख
तो उनके बच्चों की शौक
इनकी जरूरतें तो उनकी अय्यासी
इनकी स्त्री की पारिवारिक चिंता
उनकी स्त्री की खरीददारी
इनके साथ साथ रहने से अनबन
उनके एक पल के साथ के लिए घुटन
इनकी चूल्हे चौकी की दिनचर्या
उनके सामाजिक स्टेटस की चर्चा
सुकूँ न इधर है न उधर है
एक को अभाव से निकलना है
दूसरे को बहाव में डूबने से बचना है
उसे बहुत मसक्कत से मिलती है रोटियां
इनका हर दिन बर्बाद हो जाती है रोटियां
कुछ भी तो नही है
न सुकूँ इधर है
न सुकूँ उधर है
हर पल जिसके होठो पर मुस्कान है
सुकून में आज वही इंसान है
©नितेश भारद्वाज
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