रविवार, 7 जुलाई 2019

स्पंदन

तेरा स्नेह
मेरे लगभग सुख चुकी
हरीतिमा की पल्लव पर
ओस की एक बूंद है
या फिर पहली बारिश की फुहार
समझ मे नही आ रहा इसे
सहेजूँ या इसमे भींग जाऊं
हवा की आवारगी सा मुझे
बहका रही है तेरी बातें
बिन कारण जग रही है ये रातें
न कोई  डोर न कोई बंधन
न कोई आशा न कोई स्पंदन
न कोई उम्मीद न  मौन की भाषा
न खोने का भय न कोई अभिलाषा
फिर क्यूँ.. क्यूँ क्यूँ
अपनो सी हो तुम
नव पल्लव हो तुम
सुखी डाल पर टिक नही पाओगी
तेरी रस फुहार से
कुछ हरा नही हो पायेगा
हाँ कुछ उकेरा जाएगा मृत पत्थर पर
जख्मो के निशान, लगभग मिट चुकी
कहानियां,
निःशब्द अकथनीय  भावनाएं
जिसे न तो पढ़ पाओगी
न समझ पाओगी
तुम में तूफान से जूझने की
अभी अपार शक्ति है
लेकिन  तिनको को रोक रखना
तेरे बस की बात नही
लौट जाओ
हाँ लौट जाओ उन हरीतिमा के वनों में
जहां तेरी कद्र है
लोगो की फिक्र है
श्रुति है संकल्प है
जहां सम्भावनाये है, सम्वेदनाएँ है
जीवन है, उम्मीद की किरण है
तेरी स्नेहिल वर्षा का आलिंगन है।
©नितेश भारद्वाज

2 टिप्‍पणियां:

  1. मुझको मालूम नहीं…. इस कविता की तारीफ:
    मेरी नज़रों मे महान‘वो’ है, जो आप जैसा हो, ।
    Very Much Thankful to you sir

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