मिथिला के दो युगों के कवि विद्यापति और नागार्जुन में मैं नागार्जुन को ज्यादा पढ़ना पसन्द करूँगा। जिन्होंने मानव वृति का उल्लेख अपने कविता में किया। भाग्य और कर्म के बीच का गिद्ध को पहचाना। जिन्होंने समाज को उसीका आईना उसी को सौंप कर विद्रोही बने। ता उम्र अपनी कलम को किसी के आगे गुलाम नही होने दिया। विद्यापति जिन्होंने श्रृंगार और भक्ति, को समाज का मुख्य स्तम्भ माना, भक्ति पूर्ण साहित्य व्यक्ति /समाज को अपनी ही नियति में बाँधे रखा जबकि नागार्जुन ने इस बन्धन को तोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ये अलग बात है कि स्वामिभक्त के अभाव में नागार्जुन अंतिम समय तक दर दर भटके। विद्यापति के सहयोगी साक्षात शिव थे तो नागार्जुन के सहयोगी साक्षात नारायण।
हम बाबा विद्यपति को पूजते हैं लेकिन नागार्जुन को समझते है, बस इतना सा अंतर है। क्यों न विद्यापति समारोह का रंगारंग उत्सव की जगह नागार्जुन का भी मानव उत्सव हो??
सोमवार, 27 मई 2019
कालजयी कवि नागार्जुन
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