(1)
देहरी पर बैठी वो
गुमसुम सी एकटक
मुझे निहार रही थी
मौन शब्द में न जाने
क्या विचार रही थी,
तेज से मद्धिम प्रकाश में
हम विदा हो रहे थे
वो यूँ ही एक टक थी
सांवली सलोनी मुखड़ा
दिल मे बसाए आ तो गया था
लेकिन उस देहरी पर ही
कुछ छोड़ आया था
लम्हो बाद गया था
आज फिर ढूढने उसे
सिवा निशान के कुछ था नही
वक़्त है वो
बदलना तो नियति थी
बदल गयी
कल वो दिल मे थी
आज किसी और की हो गयी
(2)
मुद्दतों बाद वो यूँ मिली जैसे
मातम में अपने मिलते हो
बहुत शौक जताया
ढाढस बंधाया
कुछ जख्मो को सहलाया
कुरेदा
और कुरेदने की वादा कर गई
अपनी अहसासों की
उपस्थिति दर्ज कराती रही
किसी और की है वो
ये बताती रही
दुआएं बहुत दी वो
मेरे सलामती का
बिन साथ जीने की नुख्सा
बताती रही
(3)
अब वो
मेरे इल्ज़ाम से डरती है
मेरी थी कह तो लेती है
किसी बदनाम से डरती है
भरोसा करती है
भरोसा दिलाती नही
किसी ओर के भरोसे से भी
डरती है
प्यार पाना नही खोने का नाम है
एक अहसासों से जीने का नाम है
तू ना सही
तेरी बन्द आंखे ,मौन शब्द
बची जिंदगी के लिए बहुत है
वो मेरे नाम से भी डरती है।
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