शुक्रवार, 1 मई 2020

ग़ज़ल लिख देता

नशीली नयनो की पलक झुक जाए 
तो ग़ज़ल लिख देता
फिर होठो पर शबनम बिखर जाए
तो ग़ज़ल लिख देता
पहर दोपहर रात तक हो रही थी बातें
बात पूरी हो जाये 
तो ग़ज़ल लिख देता
एक मुद्दत से ठहरी हुई है कुछ शब्द
जो कहना था एक दूसरे से
आज गर तू बोल जाए 
तो ग़ज़ल लिख देता
अक्सर मेंहदी से सजाती रही तुम 
इन हाथोंको 
मेरे हाथों में ये हाथ आ जाये
तो ग़ज़ल लिख देता
 यूँ ही तुम दुपट्टे की आड़ से झांकती रही 
 लाज की गहनों में लिपटती रही
कभी करीब आकर मुझसे
मेरे पहलू में सिमट जाए 
तो ग़ज़ल लिख देता।
©nitesh

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