तो ग़ज़ल लिख देता
फिर होठो पर शबनम बिखर जाए
तो ग़ज़ल लिख देता
पहर दोपहर रात तक हो रही थी बातें
बात पूरी हो जाये
तो ग़ज़ल लिख देता
एक मुद्दत से ठहरी हुई है कुछ शब्द
जो कहना था एक दूसरे से
आज गर तू बोल जाए
तो ग़ज़ल लिख देता
अक्सर मेंहदी से सजाती रही तुम
इन हाथोंको
मेरे हाथों में ये हाथ आ जाये
तो ग़ज़ल लिख देता
यूँ ही तुम दुपट्टे की आड़ से झांकती रही
लाज की गहनों में लिपटती रही
कभी करीब आकर मुझसे
मेरे पहलू में सिमट जाए
तो ग़ज़ल लिख देता।
©nitesh
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