शुक्रवार, 8 मई 2020

मेरा एकान्तवास 40

#मेरी_अनुभूति #मेरा_एकान्तवास 40
मैंने बहुत प्रयास किया कि मै कुछ करूँ, कुछ नया, कुछ अलग, कुछ बेहतरीन, कुछ जीवन यापन लायक, कुछ सम्मानित होने लायक, कुछ पीढ़ियों के लिए, कुछ अपनो के लिए, कुछ अपने लिए.....सम्भव नही।  आप सोच सकते है बेहतर करने को, आप प्रयास करसकते है बेहतर करने के लिए, आप दो कदम चल सकते है बेहतरी के लिए, लेकिन सफलता आपके हाथ हो ये जरूरी नही। जिसने भी कहा कि कठिन परिश्रम से सफलता हासिल की है वो केवल कठिन परिश्रम किया है सफलता तो किसी और ने दिया है, बहुतेरे कठिन परिश्रम करते है लेकिन सभी सफल नही होते, कितनो ने तो सारी उम्र लगा दी, किसी की जीवन की आखिरी पड़ाव में सफलता मिली तो किसकी शुरुआत में हीं। सफलता सदैव नियंता के हाथ है, हमे तो बस उस पथ पर कार्य करना है। आपको किस कार्य मे सफलता मिलेगी यह भी नियंता के हाथ ही है। कभी आपकी रुचि ही सफल हो जाती है तो कभी अनचाहा कार्य ही आपको शोहरत दिला देता है। लेकिन किसी न किसी पथ पर निकलना तो पड़ेगा ही। यह दुनिया अंधेरे में टटोलने जैसा है। सैकड़ो जी जान लगा कर सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी करते है और चंद कदमो से बहुतेरे चूक जाते है, वही कुछेक साधारण परिश्रम से सीमित संसाधनों में भी प्रथम प्रयास में सफल हो जाते है। चर्चा सदैव सफलता की होती है, कभी किसी ने असफलताओं की किसी से नही की। सफलता और असफलता का श्रेय कर्ता की ऊपर तय कर दी जाती है। जबकि सब नियंता यानि ईश्वर के हाथ है। हम तो कार्य ही करते है। हमे क्या करना है, किस रास्ते जाना है , कब अवसर मिलेगा और अवसर का लाभ कैसे उठाना है, ये सब पहले से तय है। आपका आलस्य, क्रोध पाप , पुण्य, प्रसन्नता,निराशा, हानि ,लाभ, प्रतिष्ठा, निंदा,घृणा,आरोप ये सब पूर्व निर्धारित है ,बस हमे उसकी भूमिका अदा करना है, नित्य प्रति तो यही अदा करता हूँ।

मेरी छोटी मोटी खुशी और बड़ी से बड़ी निंदा, तिरस्कार सभी का जिम्मेदार मैं खुद को निर्धारित नही करता। और ना ही मैं खुशी से झूम उठता हूँ ना ही निंदा या तिरस्कार से विचलित होता हूँ।यह तो मेरी नियति का दिया हुआ उपहार है। समय का फेर है। मेरा कुछ भी नही। कुछ बेहतर,कुछ अच्छा करने की इच्छा सबको सदैव रहती है,और इस अवसर का इंतज़ार भी रहता है, बस आपको अवसर तो मिले। बुरा करना और बुरे राह पर चलना भी इतना आसान नही।आप किसी अपराध को अंजाम देना चाहते है लेकिन वह भी तभी सम्भव होगा जब नियति चाहेगी। सम्भव है आप पछके ही गिरफ्त में आ जाएं, जिसे आप क्षति पहुचना चाहते है वो आपको अवसर ही न दे। आप जिसकी हत्या करना चाहते है वह आपको निर्धारित समय पर मिले ही न, या आप मौके पर पकड़े जाएं, या फिर आपका हथियार साथ न दे। इसकी भी सफलता आपके हाथ नही है ,बस आप इस कार्य के पथ पर चल पड़े है ,अंजाम तो नियति के ही हाथ है। 
आप बस कार्य करें, लेकिन खुद को उसका जिम्मेदार न समझे। वह कार्य उचित हो या अनुचित। बहुत बुरे कार्य के बाद भी लोग प्रसन्नता पूर्वक जीवन का सफर पूरा कर लेते है, और अच्छे कार्य के बावजूद भी जेल में रहना पड़ता है। बुरे कार्य के लिए  दंडित होना या जेल हो जाना एक आत्मसंतुष्टि तो देती है लेकिन निर्दोष होने पर निराशा और क्रोध मिलता है, लेकिन दोनों स्तिथि में आपका कोई दोष नही। आप तो बस एक भूमिका में है।आध्यात्मिक होना भी आपके बस में नही है , वैराग्य भी आपके बस में नही है। सब बुद्ध भी नही बन सकता। राम बनना राम का बस में नही था वह भी पूर्व निर्धारित था। राम की सभी मनोदशा भी पूर्व निर्धारित था। इस तरह हमारी भी अलग अलग घटनाक्रम पूर्व निर्धारित है।इसलिए किसी पाप, पुण्य, अच्छा बुरा से क्या घबराना, क्यूँ निराश होना , मुझे तो बस निर्धारित पथ पर चलते जाना है। जो प्रसंशा, सम्मान या घृणा और तिरस्कार मिल रहा है वास्तव में वह आपको नही मिल रहा , वह तो आपकी नियति को मिल रहा है जो पूर्व निर्धारित है। इसलिए निराशा हताशा का कोई कारण नही।दुःख का कभी कोई कारण नही । स्वयम को प्रोत्साहित ही करना श्रेयस्कर है।©nitesh

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