#इश्क_जिंदा_है
तू कहीं और कैद
मैं कहीं और कैद
वायरस का पर्दा से
झांकती है जिंदगी
हर झंझावातों में भी
तुझे
तलाशती है जिंदगी
बेशक ये दौर मौत का है
इन रस्मो रिवाज में
अब भी
इश्क ज़िंदा है
कुछ भी याद नही है
न तेरा रूठना
न तेरा मुस्कुराना
इन सन्नाटों में आज
खुद को
ढूंढती है जिंदगी
न इंतज़ार न बेकरार
इतनी कम जरूरतों में भी
भूख के लिए
भटकती है जिंदगी
हर चीज अनिश्चितता में है
सारी उम्मीदों पर पहरा
लॉक डाउन का है
लेकिन मंद्धिम पड़ रही धड़कनों में
अब भी
इश्क ज़िंदा है।
©nitesh
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें