शुक्रवार, 8 मई 2020

मेरा एकान्तवास 36

#मेरा_एकान्तवास 36
ग्रामीणों में भावनात्मक एकता एक अदृश्य डोर से बंधी रहती है ,कालांतर में गांव पर भी शहर की आबोहवा पहुँचने लगी है, अब लोग नितांत निजी जिंदगी जीने लगा है, उन्हें अपनी पुरातन संस्कार कबाड़ की टोकरी लगता है। मुझे आज भी याद है जब मैं सहपाठियों के साथ गांव के ही हाईस्कूल से पढ़ कर लौट रहा था, उस समय मैं 9th का स्टूडेंट था, बड़ी क्षेत्रफल वाले मेरे गांव की उत्तर छोर पर था यह स्कूल।लगभग 2 किलोमीटर प्रतिदिन चलकर स्कूल जाता और वापस आता। रास्ते मे एक चौक पड़ता था, कदम के पेड़ होने के कारण यह कदम चौक के नाम से विख्यात है, जहां से लोग बस पकड़ते थे, आज भी यह चौक आबाद है। वहाँ उस समय चौक पर 6 से 7 दुकानें ही हुआ करती थी, जिसमे दो साइकल मरम्मत की एक मिठाई की , एक दो पान तम्बाकू की। एक डॉक्टर साहब का क्लिनिक था फुस का। लगभग 15 किलोमीटर की दूरी में यही डॉक्टर साहब लोगो के जीवन रक्षक थे।  मरीजो के साथ सहृदयता के साथ पेश आते तो कभी दवा सही नही लेने पर बुजुर्गों की तरह बेतरतीब डांटते भी। आज इसी क्लिनिक पर बहुत जमावड़ा लगा था। युवा, बुजुर्ग महिलाएं सब घेरे खड़ी थी। समझ मे नही आ रहा था कि ऐसी कौन सी अनहोनी हो गई कि पूरा गाँव यही जमा हो गया! सब एक दूसरे से खुसूरफुसर कर रहे थे लेकिन हम विद्यार्थियों को कोई बताने को तैयार नही,  भीड़ में अंदर जाकर देखने की साहस भी नही था, शायद बड़े लोग डांट देते ।एक बूढ़ी दादी छाती पीटते बड़बड़ा रही थी कि , अन्याय हो गया 24 /25 साल के अमुक युवक को गेहूमन सांप काट लिया। अब क्या होगा!हे दैव अनर्थ हो गया। मुंह से झाग भी दे रहा है, कैसे बचेगा!!!
 गांव में अक्सर साँप काटने वाले पीड़ित का इलाज झाड़ फूंक से ही किया जाता था लेकिन यह एक अच्छी पहल थी कि लोग डॉक्टर के यहाँ ले आये थे। साँप बहुत जहरीला था, जहर तेजी से फैल रहा था, एक सज्जन को देखा नीम का कुछ पत्ता भी लेकर आये। खबर लगी कुछ देर में कई गांव से ओझा भी आने वाले है झाड़ फूंक के लिए। हर लोग दुआ कर रहे थे। यह समाचार लेकर मैं घर पहुंचा। लेकिन घर मे पहले से पता चल गया, मुझसे महिलाएं ताज़ा खबर चाह रहीं थी। रात हो गई लेकिन इलाज चल रहा था , झाडफूंक भी जारी था, डॉक्टर साहब कुछ भी साफ साफ कहने की स्थित में नही थे। उस रात पूरे गांव में शायद ही किसी के घर ठीक से खाना बना हो , बड़ा गांव और सभी पल पल भाग कर चौक पर जा रहे थे, लौटने वालो से लोग पकड़ पकड़ कर हालात का जायजा ले रहे थे। दूसरे दिन भी इलाज जारी था। पूरे गांव में लोगों की सांस अटकी थी।हरलोग अपने अपने तरीके से देवी देवता की मनौती मानने लगे। मेरे जीवन की यह पहली ही घटना थी कि हजारो लोग किसी के  जान बचाने के लिए प्रार्थना कर रहे हो। इसके बाद अमिताभ बच्चन के लिए भी शहरों में ऐसी प्रार्थना और हवन किया गया।पूजा पाठ, प्रार्थना, हवन पूजन का यह दौर चार दिन तक चलता रहा। चार दिन तक यह तनाव भी बना रहा ,चौथे दिन डॉक्टर साहब ने उम्मीद जता दी तब जाकर पूरे गाँव मे शांति हुई। महिलाएं घर से निकल कर देवी पूजन करने गईं। लोग बाग देखने को उमड़ने लगे।बाद में मैं इन्हें जब भी देखता हूँ इनको मुझे इनका पुनर्जन्म ही याद आता है। वे आज भी सम्पूर्ण गांव में सम्मानित , और सार्वजनिक हित के लिए एक मृदुभाषी, सामाजिक व्यक्तित्व है।आज भी नवरात्रि पर दुर्गा पूजा में हवन पूजन और प्रसाद वितरण करते मिल जाएंगे। ईश्वर द्वारा प्रदत्त पुनर्जन्म का उपहार को आज भी बखूबी निभा रहे है। जीवन कितना मूल्यवान होता है,  और ग्रामीण परिवेश के यह पारिवारिक रिश्ता का डोर कभी कितना मजबूत हुआ करता था, आज बस इसे स्मरण ही कर सकते है। व्यवहारिक में अब वो दिन कहाँ!!©nitesh
क्रमशः

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