#मेरा_एकान्तवास 37
आज की नौनिहाल और नई पीढ़ी बचपन का आनंद कहाँ ले पाए जो हमारे जमाने मे था, बेशक खिलौने इलेक्ट्रॉनिक नही थे, फोन असली नही थे लेकिन मिट्टी का दो प्याला या माचिस की खाली डिब्बा में छेद करके उसे धागा से जोड़कर आपस मे बात करके जो खुशी मिलती वो आज एक लाख के एप्पल मोबाइल से भी नही मिलती। मिट्टी में उछल कूद कर धूल धूसरित होकर जो आननद आता वो आज हजारो के डनलप गद्दे पर भी नही आता, नही जॉन्सन के बेबी पावडर में मिलता।, उस दिनों बच्चों को चूसने के लिए भी प्लास्टिक निप्पल की जगह रंगीन लकड़ी ही चूसकर खुश होना पड़ता। कांच की गोली(कंचा) खेलना, दस पैसे के सिक्के को गुच्ची में पिलाना, सिगरेट के डिब्बे को फाड़कर ताश के गड्डी बनाना, साइकल की टायर को लकड़ी से हाँकना। मिट्टी से ही हाथी, घोड़े, सेव, आम,संतरा, आदि बना कर अपनी कला का परिचय देना...उफ्फ कितने काबिल थे हम!एक कविता उस समय बहुत प्रसिद्द था, "मरे तो लकड़ी ,जिए तो लकड़ी , .. देख तमाशा लकड़ी का ....." पहली बार साइकिल चलाना भी मैं सीट पर बाजू रख कर हाफ पेडल मारकर सीखा था, कक्षा 5 में साइकल की सवारी पढ़ कर अपनी हालात याद आने लगती।एक बार इसी तरह हाफ से फूल पेडल मारते हुए कैंची ही साइकल चला रहा था कि एक सफेद रंग का गली का कुत्ता ने काट खाया। जांघ में में चुभाया हुआ उसके तीन दांत का निशान अब भी है। उस समय कुत्ता काटने और उससे उतपन्न रेबीज एक खतरनाक बीमारी होता था। कुछ लोगो ने सलाह दिया कि झाड़फूंक कराओ। लेकिन मेरे अभिभावक डॉक्टर के शरण में जाना उचित समझा, उनदिनों कुत्ता काटने पर 14 मोटी वाली सुई पेट मे लगती थी। प्रति एक दिन बाद मुझे खाली पेट धनबाद रेलवे अस्पताल में सुई लगवाने जाना पड़ता। कंपाउंडर जानवरो की तरह मेरे पेट की चमड़ी को चुटकी से पकड़ कर उसमे मोटी सुई चुभो देते। दर्द से मैं कितना चिल्लाया था वो अस्पताल के छत को आज भी याद होगा। सात सुई नाभि के एक तरफ तो सात दूसरी तरफ, पेट नही क्रिकेट का पिच हो गया था मेरा। उन दिनों कुत्ता काटने पर रेबीज से लोग कुत्ते की तरह भौंक भौंक कर मर जाते थे। फिर वो जिसे काट ले उसका भी वही हाल होता। मैंने तो पारम्परिक नुक्शा भी अपनाया था, सात कुँआ में जाकर झांका भी था।अब तो कुँआ ही मिलना मुश्किल है। मिट्टी के गोले से झार फूंक भी करवाया, उस मिट्टी के गोले से कुत्ते का सफेद बाल निकलता था। कई दिनों के बाद जब बाल निकलना बंद हो गया तो यह मान लिया गया कि विष खत्म हो गया।डॉक्टर ने कहा था कि 14 दिन के अंदर अगर कुत्ता मर गया तो समझिए आपको रेबीज असर कर गया ,और वो कुत्ता पागल रहा होगा। नही तो इंजेक्शन लगवाने की भी कोई जरूरत नही। अब 15 दिन उस गली के आवारा कुत्ते का निगरानी कौन करे, सो इंजेक्शन लगवाना ही उचित था। बचपन की इस खेल खेल में कुत्ता भी अपना खेल खेल गया, बाद में तो मैं , बिच्छु, और साँप का भी शिकार हुआ। अब तो हालात ये है कि आदमी के अलावा किसी और का जहर काम ही नही करता। बस अब आदमी से ही डरता हूँ, जिसका अभी तक कोरोना की तरह कोई वैक्सीन नही बना है। ©nitesh
क्रमशः
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