#मेरा_एकान्तवास 42
कोरोना संकट में लॉक डाउन का दूसरा चरण खत्म होने वाला था 3 मई को लेकिन उससे दो दिन पहले ही गृह मंत्रालय ने इसे 14 दिन और बढ़ा दिया यानि लॉक डाउन का तीसरा चरण 17 मैं तक रहेगा। डंकर मन विचलित हो गया था।रोजगार के खातिर बिहार से पलायन कर रोहित ने यही एक 15 हजार रुपये की नौकरी कर रहा था, पार्ट टाइम में एक दुकान पर 5 हजार की और वैकल्पिक व्यवस्था थी। गांव में हर महीने 7 से 8 हजार रुपया बचाकर भेज दिया करता था। लेकिन इस लॉक डाउन ने 40 दिनों में खस्ता हाल कर रखा था, गांव जाने की कोई व्यवस्था नही था, पता नही नौकरी बची रहेगी या नही, फिर गांव में भी तो रोजगार नही है, इसलिए रोहित ने लॉक डाउन खुलने का इंतज़ार करना उचित समझा। लेकिन ये क्या लॉक डाउन का तीसरा पार्ट भी शुरू होने की घोषणा हो गयी। मन बेचैन था, साथ मे रहने वालों का भी यही हाल था। 3 मैं को सरकार की ओर से एक राहत भरी खबर आई कि कल से 10 से पांच कुछ दुकानों के साथ शराब की दुकान मतलब वाइन शॉप भी खुलेगी। मन मे एक कौतूहल से होने लगा, लगभग दो महीने हो गए थे मदिरा पान के, लेकिन क्या जरूरर। फिर लगा कि पहला दिन कुछ बोतल खरीद लिया जाय तो एक बहादुरी होगी। साथियों के साथ पीने का आनंद और दुकान खुलते ही शराब खरीद लाने का जो बहादुरी लोगो की बीच सुनाया जाएगा तो एक अमीर होने का अनुभव मिलेगा। फिर क्या था रोहित ने योजना बना डाली। बटुआ में 500 रुपये का एक नोट था, कुछ फुटकर भी, और आय की अनिश्चितता बरकरार थी। 3 साथियों से दो दो सौ रुपये सम्मलित कर कुल जमा आठ सौ रुपये लेकर कश्मीर गेट पर एक वाइन शॉप पर सुबह 8 बजे ही लाइन लगा दिया।
दिन के दस बजे और माता जी के जयकारे के साथ वाइन शॉप खुल गई, लोग ताबड़तोड़ आर्डर देकर बोतल खरीदने लगे। सुबह जल्द आने के कारण रोहित का नम्बर भी आने वाला ही था। जैसे जैसे दुकान का काउंटर नजदीक आने लगता, उत्साह और बीटल की प्यास और तीव्र होने लगती। बस अब क्या रोहित से आगे 5 ही खरीददार शेष थे, पीछे तो न जाने कईं किलोमीटर का लाईन लगी थी। उतावलापन अब चरम पर था कि मोबाइल की रिंग टोन बज उठा , झट मोबाइल जेब से निकाला ,शायद दोस्तो का हो, और उसे खुश खबरी बता दे , लेकिन ये क्या फोन तो गाँव से माँ का था।
रोहित ने झट फोन उठाया और बोला " माँ प्रणाम!!अभी थोड़ी देर में कॉल करता हूँ, अभी व्यस्त हूँ।
खुश रहो बेटा, रोहित ,बस इतना कहना था कि तुम शराब खरीदने घर से मत निकलना। बहुत बड़ी यह महामारी है। टीवी पर दिखा रहा है कि बहुत भीड़ है, लोग सट सट के खड़े है। बेटा ऐसा मत करना।
माँ ने चिंता के साथ हिदायत देते हुए बोली।
नही माँ! तुम निश्चिंत रहो, बाद में फोन करना।
रोहित ने झूठ बोलने की असफल प्रयास किया था।
मां ने फिर कहा "ठीक है! इसलिए बोल दिए कि सुबह ही गांव में बहुत जोर आंधी तूफान आया था, एस्बेस्टस वाला पूरा छत उड़ गया है। पश्चिम का दीवार भी गिर गया है, उसमे तुम्हारे छोटका बेटा संजू का बायां पैर दबकर टूट गया है। हम लोग अस्पताल में है। अच्छा बाद में फोन कर लेना।" माँ मोबाइल काटने ही वाली थी कि रोहित बोल उठा, ""कितना चोट लगा है संजू को??
बस पैर ही टूटा है, बहुत चिल्ला रहा है। डॉक्टर साहब प्लास्टर कर रहे है। बेटा, वहाँ पैसा बचाकर रखना, घर पर अब कुछ रुपया भी नही बचा है, गेंहू बेचकर डॉक्टर साहब को फीस दूंगी, तब तक उधार रहेगा। बेटा घर भी छवाना पड़ेगा। दीवार की भी मरम्मत करवाना है, तुम्हारी बीवी भी बीमार है, बेटा पैसा जरूर बचाकर भेजना, शराब नही पीना।
रोहित दुकान की काउंटर तक पहुंच चुका था। सेल्स मैन ने पूछा कौन सा ब्रांड कितना चाहिए"
रोहित एक हाथ से मोबाइल पकड़ा था और दूसरे हाथ से वो आठ सौ रुपया निहार रहा था। । एक टक दुकान के शोकेस में लगें बोतलों को देखा और फिर बिना कुछ बोले लाइन से निकल गया।
दुकानदार ने घूरते हुए बोला हद है जब नही लेना था तो घण्टो लाइन में खड़ा ही क्यूँ था।
पीछे वाले ग्राहक ने कहा""पागल है साला! पक्का वाला दारूबाज नही है।"
©nitesh
क्रमशः
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