शुक्रवार, 8 मई 2020

मेरा एकान्तवास 38

#मेरा_एकान्तवास 38
उम्र लम्बी नही जीवन बड़ा होना चाहिए। ये वाक्य अक्सर सुनता रहा हूँ,लेकिन  इन शर्तों पर जीने वाले आकाश में कुछ नक्षत्र की तरह ही होते है। बाबूजी के रेलवे से अवकाश के बाद मैं चोपन से ओबरा जाकर रहने का मन बना लिया, और  यही रहकर  रचनाधर्मिता का कार्य करने लगा। इस क्रम में कई स्थानीय विभूतियों से परिचय होना स्वाभाविक ही था। अधिक तर लोग प्रोत्साहित करते तो बहुतेरे मेरे आलोचक भी थे।  कुछ हजार लोगों का कस्बा ओबरा का जीवन पावर हाउस और पत्थर व्यवसाय ओर ही आधारित रहा है, इससे इतर रोजगार वालों का कोई स्थान नही रहा, उसमे मैं भी था। आर्थिक रूप से सम्पन्न सम्पूर्ण कस्बा एक परिवार जैसा ही रहा है। मुझे याद नही कोई भी गरीब लाचार दवा के लिए पैसे के अभाव में चल बसा हो। किसी भी गरीब का इलाज या दुर्घटना होने पर मिनटों में लाखों रुपये लोग सहयोग करके पीड़ित की समुचित इलाज उपलब्ध कराया जाता रहा है, ऐसे दर्जनों उदाहरण इस कस्बा की सामर्थ्य की कहानी लिखती है। वैसे तो यहाँ हर दूसरा आदमी वरिष्ठ समाजसेवी है , इस समाजसेवी के पीछे इनका अप्रत्यक्ष मोह भी है। परंतु इस धरती पर कुछेक ऐसे भी नक्षत्र रहे है जिसे ओबरा के इतिहास के साथ जुड़ने का सौभाग्य मिला है,स्व0 पंडित सुदामा पाठक और  स्व0 अनिल सिंह जेसी, 
उस दिन ओबरा का परियोजना चिकित्सालय  और उसके 3 किलोमीटर के दायरे में कदम रखने का जगह नही था, ओबरा और उसके आसपास के गांव के हर गरीब अमीर के आंखे नम हो गयी थी। जब क्रूर काल ने उन्हें दुर्घटना का शिकार बनाकर अल्प समय मे ही अपने साथ ले गया था।सबके मुख से यही तो निकल था कि अच्छे लोगो को शायद ईश्वर को भी जरूरत है।स्थानीय जन को देखकर ऐसा लगता मानो यह कस्बा अनाथ हो गया हो।
कुछ भी तो नही थे अनिल सिंह, न जन प्रतिनिधि, न विधायक सांसद, न ही औरों से अधिक धनाढ्य। न ही ताकतवर, न ही दबंग, और न ही दिखावे का साधन। एक सामान्य मृदुभाषी, मिलनसार, हर लोगो को दर्द को खुद का दर्द समझने वाला और एक सफल व्यवसायी।इस छोटे से परिचय के साथ एक बड़ा नाम था जेसी, यानी जूनियर चेम्बर। वो जूनियर चेम्बर के एक कर्मठ और अति सक्रिय कार्यकर्ता थे, इन्होंने आसपास के कई गांवों में जो उस काल मे आदिम युग की तरह जीवन निर्वाह करने को मजबूर थे उनके लिए यह एक भगवान की तरह थे। स्थानीय लोगो के सहयोग से  न जाने कितने सामाजिक कार्य किये।शायद ही कोई समस्याग्रसित व्यक्ति हो जिसने उनसे अपनी बात कही हो और उसका समाधान न हुआ हो। आर्थिक मदद के अलावा भी वह हर समस्या में जनता के बीच खड़े मिलते।  मिलनसार व्यक्तित्व के कारण मुझे नही लगा कि किसीसे कभी विवाद रहा हो। इन कारणों से शासन प्रशासन में भी अच्छा सम्मान था इनका। बहुतेरे आज भी इस तरह की समाज सेवा करते है लेकिन इसके लिए वह पहले ही समाज को बता देते है कि वह विधायक या किसी अन्य पद की चुनाव की तैयारी चल रही है, वे अपने किसी अप्रत्यक्ष एजेंडा के तहत ही सेवा भाव मे लगे रहते है ,इसलिए उनका सम्मान भी समाज मे नकली ही रहता है,  से तभी तक चर्चा में रहते है जब तक उनका सिक्का खनकता है। ऐसे लोगो के मृत्यु पर भी वही रुदाली कर पाते जो इनका परजीवी होते है। बाद में वही ढेरो शिकायत लेकर बाटने को तैयार रहते है, यह गरीब जनता अपनो को बेहतर पहचानती है। लेकिन अनिल सिंह जेसी इन उम्मीदों से अलग थे, निष्काम सेवा में विश्वास रखना ही उनका एक अलग छवि था। ऐसे वो सभी साधारण आदमी को पसन्द करते और उसके साथ कार्य मे लग जाते जो जमीन पर गरीबो के लिए कार्य करते। अपने इन गुणों के कारण ही वह दवा और डॉक्टर के साथ आदिवासी गांवों में पहुँच जाते।  गाँव की प्रगति के लिए योजना बनाते और उसपर कार्य करते।उन व्यवसायियों और सामाजिक लोगो के लिए भी दिन रात खड़े रहते जो समाज के सहयोग में रहता। अभी जनता को उनका भरपूर प्यार मिला भी नही था कि भगवान ने उन्हें अपने पास बुला लिए, बदले में स्थानीय जनता ने केवल आंसू ही समर्पित कर पाया था।  कम उम्र में भी उन्होंने लम्बा जीवन जिया बस यही एक सुकून है बहुतेरे धनाढ्य है और हो सकते है,लेकिन सीमित संसाधन में जनता की हृदय में स्थान बनाना आसान काम नही था कि उनके जाने के दशकों बाद ही लोगों उसी आदर सम्मान से उन्हें याद करते है। आज ऐसे ही नक्षत्र पुरुषों के कारण सोनभद्र का दक्षिणांचल धन्य है ©nitesh
क्रमशः

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