मंगलवार, 7 नवंबर 2017

मनोरंजन का घरेलू उद्द्योग

आज तकनीकी सुलभता के कारण रचमात्मक  सोच को बढ़ावा मिल रहा है , हर तरफ कुछ नया करने की ललक दिख रहा है, शिक्षित ही नही अशिक्षित लोग भी रचनात्मकता में भाग ले रहे है,यही कारण है कि देश मे मनोरंजन के क्षेत्र प्रतिदिन कुछ नया हो रहा है।मनोरंजन उद्द्योग महानगरों से निकल कर शहर और कस्बो में आ चुका है। क्षेत्रीय फ़िल्म , म्यूजिक एलबम और यू ट्यूब के लिए  आज जोर शोर से निर्माण कार्य चल रहा है।सफलता की परवाह किये बिना भी लोग आकर्षण के मोहपाश में पैसा और समय ब्यय कर रहे है।हरयाणवी, राजस्थानी,पंजाबी,भोजपुरी जैसे क्षेत्रीय फ़िल्म तो उद्द्योग का दर्जा पा चुके है और उसमें कइयों का भाग्य भी शिखर तक पहुच चुका है ,लेकिन इस आकर्षण में एक दूसरी पंक्ति के लोग भी है जो इस उद्द्योग के नाम पर युवाओ को बरगलाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे है ,खास बात तो ये है कि जो इस मनोरंजन उद्द्योग में असफल हो गए है वही अपना ऑफिस खोल कर दुसरो को सफल बनाने की तालीम दे रहे है,और हर दिन असफल लोग कुछ और असफल गायक कलाकार निर्देशक और निर्मार्ता की फौज तैयार कर रहे है ,बिहार के तो कई जिले फ़िल्म और अल्बम के लिए गृह उद्द्योग बन चुके है ,अब ऐसे कला व्यवसाई का एक फ़ौज तैयार हो चुका है जो बाइज़्ज़त सरकार से अपनी मांगे रखने के लिए योजना बना रहे है।कई क्षेत्र में तो स्थिति ऐसी बन गयी है कि दर्शक कम है और कलाकार व निमार्ता निर्देशक अधिक।दरअसल इस तरह के मनोरंजन के घरेलू उद्द्योग  के पीछे का सबसे बड़ा कारण अकुशल बेरोजगार है। जिन्होंने ने शिक्षा के लिए ज्ञान से ज्यादा प्रमाणपत्र को महत्व दिया । कम पढेलिखे लोगो के लिए रोजगार का यह आसान तरीका समझ मे आने लगा, चमक और आकर्षण के कारण बेरोजगारों को इसमें लाना भी आसान रहता है।केवल बिहार यूपी में ही प्रति वर्ष 8000 नए गायक  और इतने ही अभिनेता अभिनेत्री इस घरेलू उद्द्योग को मिलता रहता है। जो अपने माता पिता की जमा पूंजी से स्टूडियो,कैमरा मैन ,कैमरा-!लाइट, सप्लायर,यू ट्यूब चैनल के उपलोडकर्ता और निमार्ता निदेशको के व्यापार को सुदृढ़ करता है।फिर यही असफल कलाजगत के लोग खुद को निमार्ता निर्देशक बन कर नए बेरोजगारों को मनोरंजन जगत के लिए तैयार करते है।
इस तरह के मनोरंजन के घरेलू उद्द्योग में निर्मित फ़िल्म तकनीकी और साहित्यिक रूप से बहुत कमजोर होते है जिसे निमार्ता खुद ही प्रदर्शन के लिए नही लाता, अगर कुछ पर्दे पर आ गया तो किराये के सिनेमा हाल में  प्रदर्शन के लिए भी कलाकारों से ही पैसा वसूला जाता है ,मुमकिन है कि दर्जन भर दर्शक मिल जाये लेकिन  इस फ्लॉप फिल्म के कई हीरो और हीरोइन इस बाजार के लिए तैयार हो जाते है।लगभग 95 प्रतिशत इस तरह के फ़िल्म बिना किसी प्रयोजन का बनता है जिसे प्रदर्शित नही किया जाता।यही हाल शार्ट फिल्मो का है, वो तो भला हो यू ट्यूब का जिसपर  लोग उपलोड कर अपनी  इतिश्री कर लेते है।आजकल कम्पनी के नाम पर बने यू ट्यूब चैंनल पर एक गाने के उपलोड का भी एक हज़ार से तीन हज़ार तक  नए गायको से वसूल कर लेते है।फिर बेसुरे और संगीत से दूर रहने वाले कथित गायको को भी ब्रांड गायक बनने का लॉलीपॉप दे दिया जाता है।
रुपहले पर्दे के मनोरंजन के इस खेल में बहुत तेज़ी लाखो युवा दिग्भर्मित हो रहे है, कई तो आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो रहे है , इस उद्द्योग के आड़ में यौन शोषण और सेक्स का ब्यापार भी तेजी से पांव पसार रहा है , दरअसल मनोरंजन का यह नशा जिसे एकबार लग जाये फिर वो यंहा से निकल कर कोई दूसरा रोजगार करने में खूद को सहज नही  पाता। इस कारण इसी धंधे में नए लोगो को फ़ौज तैयार करता है । कम पढेलिखे अभिवावक भी  अपने बच्चों पर इस तरह शार्ट कट सफल होने की उम्मीद में  पैसा खर्च करने लगते है।
मनोरंजन के इस घरेलू खेल में समय से संज्ञान नही लिया गया तो जल्द ही स्थिति भयावह हो जावेगी, युवा रोज ठगे जाएंगे और घर परिवार टूटता जाएगा।अपराध, सेक्स,और आत्महत्या जैसी हालात बढ़ने लगेंगे। इसलिए सरकार को इस पर पहल करनी चाहिए , क्षेत्रीय फ़िल्म और मनोरंजन के लिये भी अकादमी ,स्कूल खोलने चाहिए, योग्य कलाकार और  निर्माताओ को काम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करना चाहिए। ऐसे नियम बनने चाहिए कि क्षेत्रीय फिल्मो को आसानी से सिनेमा हाल में प्रदर्शित किया जा सके। फ़िल्म और मनोरंजन के क्षेत्र में जाने के लिए प्रशिक्षण और ऑडिशन की व्यवस्था सरकारी स्तर पर हो ताकि आर्थिक और यौन शोषण से बचा जा सके। क्षेत्रीय मनोरंजन  को भी लोक कला की तरह प्रोत्साहन और संरक्षण की आवश्यकता  है।अन्यथा यह घरेलू मनोरंजन उद्द्योग विषबेल साबित होगी।

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