अपनो से जब आस टूटती है
आँसू जब दो बूंद टपकती है
उसी दिन बन्धन टूटता है
उसी दिन वैराग्य पनपता है
दर्द में एक आध्यत्म उमड़ता है
उम्मीद में भी ईश्वर दिखता है
भ्रम का धुंआ छटता है
खुद का विश्वास बढ़ता है
जिस दिन विश्वास को लुटता है
उसी दिन वैराग्य पनपता है
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