गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

क्या विकास के लिए नक्सलिज़्म जरूरी है

सोनभद्र के सुदूर आदिवासी ग्रामीण अंचल में आज जो कुछ भी विकास दिख रहा है वो नक्सली गतिविधियों का देन है। सरकार  गरीब जनता की भलाई के लिए जो भी योजना बनाती थी वो शहर और कुछ जिले के वरिष्ठ अधिकारियों के जेब तक ही रह जाता था। अनपढ़ ,भोले भाले गरीब आदिवासी इन सब योजनाओ से अनभिज्ञ थे, अभाव और दुःख को अपनी नियति समझ बैठे थे ,ऐसे में पड़ोसी राज्य से नक्सलियों का आमद इनके दुखती रग पर मरहम लगाना शुरू किया,स्थानीय जनता किसी भी अपराध से अनभिज्ञ थे , इन्हें तो भूख से सूखती पेट की आंत को तर करना था,इसलिए अपने कर्मठ बच्चे को इस कार्य मे लगा दिया , जब ये भोले भाले युवा आदिवासी जिसे लोग नक्सली कहने लगे ,  वो भी छोटी मोटी घटना करना सीख लिए,सरकार की नुमाइंदे और उसकी हमदर्द को निशाना बनाया जाने लगा तो हुक्मरानों की आंखे खुली ,फिर विकास के लिए जंगल पहाड़ में उतरने लगे। पुलिस ने विकास का ज़िम्मा उठाया औऱ राजस्व व सम्पन्न जनता के सहयोग से विकास की पहिया चलानी शुरू कर दी , उसमे भी  राजस्व विभाग ,वन विभाग , और जिन्हेंविकास करने का जिम्मा था उनके अफसरान भी लूट करने में पीछे नही रहे , फिर भी पुलिस की सक्रियता से आदिम युग मे जीने वाले आदिवासियों को लोकतंत्र को समझने  और उसमें भागीदारी  रास आने लगी । तत्कालीन पुलिस व्यवस्था से विकास की पहिया लुढकने लगी। परन्तु वही जहाँ इन्हें नक्सलियों की गोली से भय था , नया नक्सली पैदा होने से भय था ।बाँकी का वह क्षेत्र आज भी अपने भाग्य और नीयति को ही कोस रहा है।
तो क्या विकास के लिए नक्सलिज़्म ही जरूरी है?क्या अपनी प्रारंभिक जरूरतों के लिए भी बंदूक उठाना जरूरी है ?या विनाश का भय दिखाना जरूरी है ?नही तो चंद दिनों के लिए बाहर से आये ये जिला के अधिकारी ,खनन ,और प्राकृतिक दोहन में अपने हिस्सेदारी लेने में ही समय बिता देते है ।फिर उनका स्थानांतरण और फिर से एक नया अधिकारी करोड़पति बनने आ जाते है । बाहर से आये अधिकारी और ब्यापारी  वैध अवैध धन कमाकर अन्यत्र भेज देते है,और समेट कर चल देते है , इसतरह सोनभद्र के विकास का नित्य चीरहरण होता रहता है ।सरकार के नुमाइंदे निजी लाभ वाले योजनाओ पर बकुल ध्यान लगाएं बैठे रहते है । बड़े के लापरवाही से मातहत भी खूब फायदा उठाते रहते है ,नतीजा शिक्षा व्यवस्था, जल, और बिजली  विभाग के लिए सुदूर आदिवासी अंचल अछूत से लगता है।
आज स्थिति यह है कि जनपद नक्सली मुक्त है, पुलिस और प्रशासन आराम  की नींद में है , पुनः उन गरीब आदिवासियों के हिस्से से  हुक्मरानों के बच्चों के खिलौने और सैर सपाटे हो रहे है,जिम्मेदार खनन की हिस्सेदारी और छीनाझपटी में ब्यस्त है , आरोप प्रत्यारोप जारी है लेकिन वो क्षेत्र आज फिर हाशिये पर है । फिरसे किसी मेहमान का इंतज़ार है ।   हो सकता है गए हुए मेहमान वापस आ जाये लेकिन हर हाल में पीड़ा फिर से सोनभद्र का जंगल ही सहेगा , प्रशासन फिर से सक्रिय हो कर बजट बढ़वा लेंगे , लेकिन आज का बजट का कोई माईबाप नही है ।तो क्या मौलिक सुविधाओ के लिए ,, सरकार की तंद्रा तोड़ने के लिए बंदूक उठाना  और भयाक्रांत करना जरूरी है??क्या ये सब इसके बिना सम्भव नही ????
©नितेश

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