आज के हम
आज से 40 साल पहले मैं मनुष्य को ईश्वर का अनमोल कृति समझता था। गांव में रहता था ,चेहरे तो कम दिखते थे,अनपढ़ होते थे लेकिन मेहनतकश और आदर्श होते थे , स्वतः सम्मान उत्पन्न होता था उनके लिए,भाषा और पहनावा से मन में श्रद्धा भाव उत्पन्न होता था ,बरबस सोचने को बाध्य होना पड़ता कि बड़े होकर इनके तरह ही बनूँगा।परन्तु आज लोग पढ़े लिखे ,और बड़े बड़े डिग्री वाले है ,लोगो की भीड़ भी बहुत है ,बड़े शहर में किसी ऊँचे स्थान से देखे तो कीड़े मकोड़े की तरह रेंगते नज़र आ ते है, भाव शून्य है, परिधान में भी कई प्रश्न है। ममता और श्रद्धा कहीं गायब है।फिर तो लगता है ईश्वर ने अन्य जानवरों की तरह मनुष्य को भी बनाया है ,संवेदना तो पशुओं के तुल्य भी नही रह गया,इस भीड़ में कहीं मनुष्य खो गया ।
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