गुरुवार, 19 मार्च 2020

मुट्ठी भर रेत


#मुट्ठी_भर_रेत
बस रेत का ही बना पाता हूँ महल
द्वार पर कुंडी लगने से पहले
लहरों में 
फिर से विलीन हो जाता है  महल
फिर कोशिशें करता हूँ
लहरों से जूझता हूँ
थकता हूँ पर हारता नही
कोशिश अब भी करता हूँ
हार नही मान सकता
लेकिन समर्पित करता हुँ
इन लहरों को अपना जिद्द
हर बार मिटने के लिए 
जमा करता हूँ रेत
हाँ लहरों की पहुंच से दूर
बना लेता एक महल
लहरों से इतर जुनून तो है 
परन्तु वो रेत कहाँ
जिससे तैयार हो महल

तू थम तो जा 
बस एक पल और थम जा
मैं निहार तो लूं अपने सपनो को
बड़ी उम्मीदों से मुझे 
इस काबिल बनाया है
इसे मिटने से पहले 
बन तो जाने दो
एक पल ही सही
इसकी गोद मे सो जाने तो दो
हाँ एक बार मेरा नाम
पुकार लेने तो दो।
मेरा प्रणाम स्वीकार कर तो लेने दो
सब कुछ समर्पित कर दूंगा
बस धूप खिल जाने तो दो।
©nitesh bhardwaj

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