केवल सांस लेना ही जीवन नही है, आपके जीवित रहने से किसी अन्य सगे सम्बन्धी ,समाज ,देश या प्रकृति को आपसे लाभ नही,आप से अपेक्षा नही तो आप का जीवन असफल है, आप स्वयं के लिए भी नही है, व्यक्ति का समाज में समायोजन उपरोक्त कारण से ही होता है।
अपने स्वभाविक गुण को समय और परिस्थिति के अनुसार बदलने में असमर्थ है तो आपको आर्थिक स्तर पर भी असफल ही रहना पड़ेगा, किसी भी व्यवसाय ,या नौकरी में सफलता नही मिलेगी। लोग वस्तुनिष्ठ से प्रभावित हो आपसे जुड़ते है ,व्यक्तित्व तो आपका ही होता है वो नितान्त निजी है।हर व्यक्ति का अपनी अपेक्षा है और उसकी अपेक्षा के अनुकूल होने पर ही आपका सामंजस्य स्थापित सम्भव है,और बिना सामंजस्य स्थापित के कोई भी कार्य या सम्बन्ध सफल नही हो सकता ,ऐसी परिस्थिति में आप कोई भी आर्थिक लाभ के कार्य नही कर सकते। कदाचित इन्ही कमियों के कारण सम्पूर्ण जीवन सभी आयामो में अभावों से जूझना पड़ा है।
आर्थिक स्वालम्बन ही आपको सभी सम्बन्धो से जोड़े रखता है, अन्यथा आप समाज और सम्बन्धियो पर बोझ रहते है।आप निक्कमा और कायर होते है, आपके सभी उत्कृष्ट विचार, कार्य अनुकरणीय नही होता, और आर्थिक समृद्धि के लिए परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाना ही सफलता है ।अपनी नैसर्गिक गुणों से भी तालमेल बिठा कर रखना आवश्यक है।जो ऐसा नही कर सकता वही जीवन मे असफल है या यूं कह लीजिए असफलता का यही कारण है।
अब प्रश्न स्वयं का है कि इस तरह के अपरिवर्तनीय गुणों वाले व्यक्ति का सामंजस्य सम्भव है??? कदाचित नहीं ,ऐसे लोग सदैव आलोचना , निंदा,अफवाहों, कलंकित होते रहने के श्रेणी में आते रहते है।ऐसे लोगो का कोई मित्र सखा नही होता,इन्हें समय रहते समाज से अलग स्वयं में जीना चाहिए, अपनी आंतरिक अनुभूति में आनंद ढूढना चाहिए, वाह्य जगत इनके लिए अनुकूल नही है।किसी एकांत में निवास करना, ध्यान, योग तप आदि ही ऐसे लोगों के लिए उचित है।अन्यथा सदैव पड़तारित होते रहना पड़ेगा। मुझे भली भांति यह स्मरण रहता है कि मेरे सगे और आर्थिक रूप से सबसे सफल सम्बन्धी ने ताना देते हुए कहा था कि आपकी औकात एक रुपये की नही है, भीख में भी कोई एक रुपया नही दे सकता फिर कोई आपको इज़्ज़त क्यों करें,और आप किसी को नसीहत किस आधार पर दे सकते है, आपके नसीहत का क्या मतलब है?..........अब तक आपने क्या किया आपकी जगह कोई और होता तो डूब मर गया होता।"
उसका ताना और गुस्सा भी जायज था, मुझे बुरा बहुत लगा परन्तु वो कह तो सत्य ही रहा था, फिर मेरी स्थिति उस बीमार की तरह था जिसका कोई अंग खराब हो और उसे कोई अपंग होने का ताना दे रहा हो। सब कुछ तो था मेरे पास सभी गुण थे सभी सोच भी थे परंतु सामंजस्य और स्वयं को बदलने की प्रवृत्ति नही था। बहुत आँसू निकले थे लेकिन उसके कथनों पर नही अपनी असफल स्वभाव पर , खुद पर, .......आखिर इन बहुतेरे फरेब को अपने अंदर समेट क्यूँ नही पाया था मैं। शायद मैं इस तरह का अकेला हूँ या और भी असफल व्यक्ति का कारण भी यही है इस सोच में कुछ उम्र और निकल गयी लेकिन हम वहीं रहे इस जलालत भरी कीचड़ में चलते रहे। हाँ इस बीच मैंने यह जरूर सीख लिया था कि आप स्वयं में खुश रहना सीख लें तो दूसरा भी आपको सुखी सम्पन्न समझने लगेंगे, आपकी आर्थिक कमियों और जलालत भरी जिन्दगी पर ध्यान नही देंगे। परन्तु आप तो वही रहेंगे जो सगे सम्बन्धी समझते रहे है।......पैसा बहुत कुछ है ये आपके पास नही तो आप कुछ भी नही , इसको कमाने के लिए ईमानदारी ही नही सबकुछ करना पड़ता है जो आपको पसंद हो या न हो।
जीवन जीना है, अपनी पहचान के साथ जीना है, लोगो के सामने एक अस्तित्व के साथ प्रस्तुत होना है तो आपको फरेबी बनना पड़ेगा अन्यथा आप बेकार है ,आपकी सारी सोच और संस्कार जिसे आप अच्छा समझते है वो सब बेकार है, बेमतलब है।और अपनी जीवन जीने के लिए , अपनी अस्तित्व बचाने के लिए , अपने सगे सम्बन्धियो ,परिवार की भविष्य को बनाने के लिए अपनाया गया कोई भी फरेब गलत भी नही है, करना चाहिए जो नही किया पूरी जिंदगी जलालत भरी होती है।
अब जब मेरे पास बहुत कम समय बचा है, शायद कुछ बचा भी न हो ऐसे में अब कुछ भी नया होना सम्भव नही है। ना अब स्वभाव में न ही नैसर्गिक गुणों में बदलाव होने वाला ही है। हैं इस बीच अपनी घुटन के बीच बहुत तप करके कुछ चीजों से दूर होना सिख लिया ,उन चीजों से भी दूरी बनाना सीख लिया जिसे मनुष्य के लिए जीते जी सम्भव नही है । अब किसी भी व्यक्ति ,वस्तु और स्थान से मोह खत्म हो गया , लोभ पूर्णतः समाप्त होने में समय है,वस्तुतः लोभ कुछ उम्मीद उत्पन्न करने लगता है कदाचित इस कारण समाप्त होने में समय लगता है। जिन चीजों से छुटकारा नही मिल पा रही है वो है द्वेष इस बाबत स्वयम को तपाने में लगा हूँ जिस दिन सफल हो जाऊं शायद स्वयम को जी लूंगा। सुख दुख,मान अपमान, लाभ हानि, अब मुझे प्रभावित नही करती। बस द्वेष से मुक्ति चाहिए। इसे प्राप्त कर लिया तो शायद यही उपलब्धि मेरे जीवन के लिए होगा,चूँकि जीवन नितांत एकांकी होता है, अकेले आना और जाना होता है तो तमाम असफलता सफलता में जीवन को मृत्यु तक बिना किसी मोह लोभ अपेक्षा, उम्मीद अधूरा सपने को पहुंचा दें तो इसे ही हम जीवन की सफलता समझ लेंगे। दुबारा इस लोक में न आना पड़े तो यह उपलब्धि होगी।वैराग्य की इस स्तिथि औरों को लिए पराजय जैसा दिखना हो सकता है लेकिन मैं ये मानने को बाध्य हूँ कि मैं कुछ भी नही जो है,जो हुआ और जो होने वाला है वो सब पूर्व निर्धारित है हम तो बस निर्धारित राह पर चल रहे है।
@नितेश भारद्वाज
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें