शपथ गणतंत्र की है कि
मन की चादर बने तिरंगा
तन भारतीय हो जाये
गैरो की खातिर अपनो से
बैर बनाकर क्या रखना
कुछ कर गुजरो ऐसा
कर्म सराहनीय हो जाये
साथ सभी का हो देश में
राग एक स्वर का गुंजित हो
पृथक पृथक जन का छोड़ भ्रम
जन जन माननीय हो जाये
देश प्रेम से ओतप्रोत
राष्ट्र द्रोही का पहचान कर
कर तिरस्कार घुसपैठियों का
ज्यों जीवन असहनीय हो जाये
शपथ गणतंत्र की है
मन की चादर बने तिरंगा
तन भारतीय हो जाये
©nitesh
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