रविवार, 26 जनवरी 2020

खत मेरा पढ़ा ही कहाँ

रात इतनी भी लंबी नही थी
सुबह होने तक 
वो जगा ही कहाँ

सात फेरों तक पहुंच जाते सफर
शपथ संबंधों का 
निभा ही कहाँ

मैं कहा था बहुत कुछ
सुना ही कहाँ

अभाव में भी प्रेम  टिक सकता था
 दूर तलक
साथ चलने को 
कदम बढ़ाए ही कहाँ

जमाने की तंग नजरो से बच सकता था
जमाने के सामने आकर
तूने प्यार 
जताया ही कहाँ

गैरो की बातों को सीने से लगाई रही
एक बार इन आँखों मे देखकर
हाल मेरा पूछा ही कहाँ

दूर हो जाती हर गिला शिकवा
तेरे किताब में छुपाया था जो खत
वो तूने पढ़ा ही कहाँ

मैं कहा था बहुत कुछ 
सुना ही कहाँ
©nitesh

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