रात इतनी भी लंबी नही थी
सुबह होने तक
वो जगा ही कहाँ
सात फेरों तक पहुंच जाते सफर
शपथ संबंधों का
निभा ही कहाँ
मैं कहा था बहुत कुछ
सुना ही कहाँ
अभाव में भी प्रेम टिक सकता था
दूर तलक
साथ चलने को
कदम बढ़ाए ही कहाँ
जमाने की तंग नजरो से बच सकता था
जमाने के सामने आकर
तूने प्यार
जताया ही कहाँ
गैरो की बातों को सीने से लगाई रही
एक बार इन आँखों मे देखकर
हाल मेरा पूछा ही कहाँ
दूर हो जाती हर गिला शिकवा
तेरे किताब में छुपाया था जो खत
वो तूने पढ़ा ही कहाँ
मैं कहा था बहुत कुछ
सुना ही कहाँ
©nitesh
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