उद्वेलित मन,
अस्थिर तन
स्वयं से जब हो विवाद
तब जरूरी हो जाता है
करना
लहरों से संवाद
अन्तर्वेदनाओ की क्रंदन को
युगों युगों से लयबद्ध
संगीत बनाता रहता है सागर
लहरों की वाद्य पर छेड़ता है
एक धुन
न कोई शिकायत न कोई प्रतिवाद
फिर क्यूँ न हो
लहरों से संवाद
युगों से नियमित
असंख्य अभिलाषा, स्वप्न
हार जीत, सफल असफल
प्रसन्न और करुण हृदय
भावनाओ की बोझ लिये
इन्ही सागर में समा
करता रहा है स्वयं का श्राध्द
फिर क्यूँ न हो
लहरों से संवाद
मान अपमान प्रिय अप्रिय
सागर भर प्रसन्नता
या सागर सा हृदय की
वेदना
सागर की तरह नित्य निखरना
या लहरों की तरह नित्य विखरना
मन के अन्तःस्थल में
बिखरते सम्बन्धो का
यही होता है पश्चाताप
फिर क्यूँ न हो
लहरों से संवाद
क्रमशः.................
©nitesh bhardwaj
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