#सोनभद्र_लोकसभा_80
आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र,जहां इनकी संख्या कम औऱ गैर जनपद,गैर आदिवासियों की संख्या में तेजी बढ़ोतरी हो रही है, नए नए कलकारखानों, बिजली घर ,खनिज खदान के कारण बाहरी लोग यहां रोजगार तलाशते आ गए है ,अच्छी आमदनी भी होने लगी, शांत और प्राकृतिक वातावरण के कारण लाखों लोग यही के होकर रह गए,लेकिन स्थानीय की हालत उतनी गति से बदली जितनी गति से मेहनतकश रोजगार के तलाश में आये लोग, लेकिन इन सबसे बड़ी बात ये रही कि आदिवासियों के हक के लिए बनाया गया लोकसभा क्षेत्र सुरक्षित तो कर दिया गया लेकिन जागरूकता के अभाव में राजनीतिक रुचि नही रही आदिवासियों में, एक मात्र स्व0 रामप्यारे पनिका इस क्षेत्र के नेता और सांसद हो पाए जिसे पाकर लोग राजनीतिक कारोबार से निश्चिंत हो गए, उनके निधन के बाद फिर से कोई इनकी तरह चमत्कारी नेता नही हो पाए, सांसद बनने के लिहाज से रामसकल जी भी दो बार सांसद रहे, स्व0 सूबेदार प्रसाद भी कुछ कार्यकाल तक बने रहे लेकिन ये संसद में अपनी उपस्थिति के अलावा जनपद की समस्याओं से देश को वाकिफ नही कराया।
लोकसभा क्षेत्र सुरक्षित रहने के कारण गैर जनपद वासी लोगो में भी यहां के राजनीतिक रुचि नही पनप पाया।नतीजा राष्ट्रीय राजनीतिक शून्य वाला जनपद बनकर रहगया सोनभद्र। सपा बसपा भी स्थानीय राजनीति में जातीय कुचक्र का शिकार हो गई। जाति में भी स्थानीय और बाहरी का षडयंत्र चला गया। राजीनीतिक शून्यता के कारण गम्भीर समस्या भी पहाड़ की तरह बढ़ता चला जा रहा है। भौगोलिक क्षेत्र भी जनपद के विकास को दो भागों में बंट दिया। समतल क्षेत्र में सुविधाएं तो आसानी से पहुंचने लगी लेकिन दूर दराज को भगवान भरोसे ही छोड़ना उचित समझा, दूसरी बात जागरुकता भी समतल क्षेत्र के बीच ही रखा गया पहाड़ो में इसे परहेज रखना उचित समझा यहां के राजनीतिज्ञों ने। जिला मुख्यालय इसका जीता जागता उदाहरण है। प्रदूषण ,फ्लोराइड समस्या, चिकित्सा व्यवस्था, शिक्षा, उच्च शिक्षा, रेल यातायात, और स्थानीय रोजगार की समस्या आज भी जस का तस है।प्रचुर सम्पदा वाला यह जनपद अपने गरीब वासियो पर आंसू बहा रहा है,। प्रदेश के अन्यलोग ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरह यहां की सम्पत्ति और रुपया अपने यहाँ तो ले जाते है लेकिन इस जनपद को दिनोदिन कंगाल बना रहे है। व्यापारियों अधिकारियों और कथित समाज सेवियों के लिए यह एक सुंदर चारागाह है।
2019 का लोक सभा चुनाव में भी आज को स्थानीय मुद्दा या समस्या नही है,राष्ट्रीय मुद्दा से स्थानीय को को इत्तिफाक भी नही है।ऐसे में सभी प्रत्याशी जो बाहरी है उनसे क्या उम्मीद किया जा सकता। पकौड़ी लाल कोल, भाई लाल कोल , और छोटेलाल खरवार को आजमाया जा चुका है, भगवती प्रसाद चौधरी जी भी बाहरी ही है उन्होंने मिर्ज़ापुर के लिए कुछ किया होगा लेकिन यह जनपद उनके प्यार के लिए तरसता ही रह है। देर से अपना नाम प्रत्याशी में सुमार करने वाली रूबी प्रसाद भी देखा जाय तो बाहरी ही है, उनकी जातीय प्रमाण पत्र का विवाद 5 साल तक चर्चा में रहा है, विधायक रहते उनकी छवि प्रशासनिक जरूर रही है, जनपद में रहने के कारण लोगो से आसानी से मुखातिब रहना उनकी खासियत हो सकती है लेकिन लोकसभा में स्थानीय मुद्दों को सही से रख पाए संदेह ही है।आज भी बहुत सारी जनता उनपर आंख मूंद कर विश्वास करने से परहेज करती है, किसी दल में स्थिर न होने के कारण लोगों को अपने मत पर विश्वास नही हो रहा, निर्दल,कांग्रेस,सपा की आंगन वो पहले ही घूम चुकी है ,नई पार्टी साथ कब तक है ये भ्रम बना हुआ है। लेकिन इन सभी उम्मीदवारों में रूबी प्रसाद स्थानीय राजनीतिक जोड़ तोड़ में आगे निकल रही है, कारण राष्ट्रीय राजनीतिक कारों की उम्मीदवार चयन में सोनभद्र को अनदेखी करना है। सोनभद्रवासी कहीं इसे दिल पर ले ले तो , भाजपा,कांग्रेस,और गठबंधन वालो के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। परिणाम तो भविष्य के गर्भ में है।
©नितेश भारद्वाज
बुधवार, 17 अप्रैल 2019
सोनभद्र लोकसभा 80
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