बिहार/मिथिला के महान कवि विद्यापति के जन्मस्थान मधुबनी जिले के बिस्फी गांव में जाकर उनके स्थान पर घण्टो ये सोचने पर विवश रहा कि इतने बड़े महान कवि जिसे मैथिल अपना आइकॉन समझते है और बंगाली इन्हें अपनी भाषा का प्रणेता , उनके इस स्थान का महत्व इतना कमकर क्यूँ है??अभी पिछले सप्ताह मोदी जी बंगाल में ये कह आये की मिथिला भाषा की समृद्धि में विद्यापति का बड़ा योगदान है इतने पर हमारे कुछ मैथिल ठीकेदारों को मिर्ची लगी और फेसबुक पर उल्टियां करने लगे। देश ही नही विदेश में भी विद्यापति के नाम पर लाखों चन्दा वसूली कर सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर भद्दे नृत्य और भोजपुरी /हिंदी पाश्चात्य गीत का प्रदर्शन करवाते है।मैथिली के 99 प्रतिशत ठीकेदार मैथिल ब्राह्मण है जो देश विदेश में इनको कैश कराते है, मिथिला राज्य बनाने के नाम पर अपने वर्ग को दिग्भर्मित करते है, मैथिली भाषा को लेकर आंदोलन करते है लेकिन इनमेसे 99 प्रतिशत लोग इस जगह पर आने के लिए सोचा भी नही। किशन यादव और उनके टीम के ग्रामवासियों ने इस स्थान को अपने मेहनत से संजो कर रखा है, पूछने पर बताते है कि कथित नेता और समाजसेवी यहां आते तो है बड़ीबड़ी बातें करके चले जाते , बयान भी देते है, आपके तरह ही बहुत सारी जानकारी इकट्ठा करते है लेकिन फिर दुबारा उनका दर्शन नही होता न ही कोई प्रगति हुई। पर्यटन विभाग ने एक हाल बनवा दिया है जो सदैव बैंड रहता है उसमें एक विद्यापति और उनके नॉकर उगना (जिसे साक्षात महादेव कहा जाता था) की मूर्ति है।, उसमे कबूतरों का बसेरा है, कभी कभार किसी संस्था या सहारा जैसे कम्पनी की मीटिंग होती है तब जाकर खुलता है, हम लोग किसान आदमी है,फुरसत मिलता है तो कभी कभार सफाई कर देते है, दुनिया मे विद्यापति समारोह के नाम पर लाखों बजट है लेकिन इस स्थान के लिए फूटी कौड़ी नही,फूल सिंह, संत कुमार जैसे कई लोग आए और विद्यापति की मूर्ति और अन्य सुविधा के लिए बोल गए लेकिन दुबारा दिखे नही,। ...
ग्राम वासियों में इन कथित मैथिलों के प्रति काफी रोष है जो विद्यापति के नाम पर अपना दुकान चला रहे है या हर शहर में मिथिला को बेच रहे है, समारोह के नाम पर, साहित्य के नाम पर, सिनेमा के नाम पर, राज्य के नाम पर या राजनीति के नाम पर।उन्होंने ऐसे सभ्य लोगो से अपील भी की ऐसे ठीकेदारों को चन्दा देना बंद करे। इससे विद्यापति की आत्मा को दर्द होता है।
जन्मस्थान पर एक 20x30 का एक हाल है, बाहर एक मंच का चबूतरा है, पीछे की तरफ शौचालय है ,एक 3 फिट की मूर्ति गेट के पास लगा है, हाल का उपयोग सार्वजनिक कार्य और मतदान के लिए किया जाता है, हाल के अंदर दो मूर्ति है, दर्जनों अलमारी है जिसमे किसी किताब या साहित्य की जगह कूड़ा रखा हुआ है, हर तरफ घास फूस उग आया है,पर्यटक के नाम पर सप्ताह में एक आध लोग आ जाते है जो वहां के ग्रामीणों से चाभी मांग कर अंदर देख कर चले आते है।
हॉल के दाहिने तरफ एक फुट दीवार से घेरा हुआ जगह है जहां #सुरंग लिखा हुआ है, पूछने पर पता चला कि यही एक प्राचीनतम जगह है ,इस सुरंग के अंदर तो कोई गया नही, माना जाता है इसी के माध्यम से विद्यापति स्नान करने जाते रहे होंगे। गांव में ही एक मंदिर है ,मान्यता है इस मंदिर में विद्यापति और साक्षात महादेव जी पूजा करते थे।
विद्यापति की जन्मस्थली जहां आज तक कोई सरकारी समारोह भी नही हो पाया, और न ही इसे पर्यटन की दृष्टि से या साहित्यिक गौरव की दृष्टि से इसे ख्याति प्रदान की गई। ये मिथिला ही नही बिहार के लिए भी दुर्भाग्य है, बिहार के हाईस्कूल से लेकर दुनिया के सभी विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य में इनकी कविता ,पद्य पढ़ाई जाती है लेकिन इनके गौरव को अक्षुण्ण रखने सरकार और समाज दोनों की उदासीनता चिंतनीय है।
#अपील
मेरा एक व्यक्तिगत अपील है कि अगर आप को विद्यापति जी के नाम पर समारोह कर रहे है तो पहले जन्मस्थली हो कर आये और चन्दा से एकत्रित धन में कुछ यहाँ व्यय करें,समारोह के नाम पर कमा रहे गायक गायिका और आयोजक कुछ आय का हिस्सा यहाँ खर्च करें, बौध्दिक जन,पत्रकार,नेता सरकार से यहां के विकास के लिए मांग करें।मैथिल साहित्यकार साल में एक बार यहाँ आकर एक कार्यक्रम करें,। जो ठीकेदार विद्यपति जे नाम पर दुकान चला रहे है और अभी तक इस स्थान पर नही आये है यहां अवश्य आये ये आपके मुंह पर कालिख के समान है यहाँ आकर धूल ले। यहां कुछ साहित्यिक पुस्तक और ऑडियो वीडियो सामग्री दे जाए। और भी बहुत कार्य है जो इस स्थान के विकास के लिए कर सकते है।.और #आखिरी में विद्यपति के नाम पर नृत्य कराने से बेहतर है मैथिली या हिंदी कवि समनेलन करवाया करें।
@नितेश भारद्वाज
मंगलवार, 9 अप्रैल 2019
विद्यापति जन्मस्थली
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