बुधवार, 7 सितंबर 2022

मुझसे मेरा शब्द

मुझसे मेरा शब्द रूठ गया


बहुत ख्वाहिश नही थी 

चाँद सितारों की

ना सोने चांदी की 

मेडल पाने की 

बस बिन बन्धन उछलकूद कर सकूं

धरा की आँचल में  हरीतिमा निहार सकूं

न जाने कैसे किस पग मेरा

दिल की एक धड़कन टूट गया

फिर मुझसे

मेरा शब्द रूठ गया


अभी तो शेष जीवन का लक्ष्य साधा था

खुद से खुद को देशाटन का वादा था

कुछ अपलक ही तो निहार पाया था

न जाने किन  अपराध से 

मेरा मुझसे

 रब रूठ गया

फिर मुझसे

 मेरा शब्द रूठ गया


अब यह अवशेष लेकर क्या करूँगा

पग बन्धन तोड़ न पाऊंगा

आश्रित जीवन का मोल कहाँ

 सांस जहाँ निर्बाध चले

अब वो पल क्षण कहाँ

परन्तु

नियति को सहना है

जो है भाग्य में उसे भोगना है

जो निश्चय है उससे डर कैसा 

जो कड़ियां

टूट गया सो टूट गया


फिर मुझसे मेरा शब्द रूठ गया

©nitesh

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