बैलगाड़ी की सफ़र
अब बहुत कम ही लोग बचे होंगे जिन्होंने बैलगाड़ी की सफ़र की हो ।और उसमें से एक जीव मैं भी बचा हुआ हूँ ,जिसे हिचकोले वाली मस्तमौला बेफ़िक्री यात्रा का आनंद आज भी याद है ।उस वक़्त पिताजी के साथ धनबाद में रहना होता था,गाँव आने के लिए ट्रेन का सफ़र गाँव से सात किलोमीटर पहले ही ख़त्म हो जाता था ,उस समय कोई फ़ोन या मोबाइल तो था नहीं की गाँव से बाबा कोई बेल गाड़ी स्टेशन भेजते !सो स्टेशन उतर कर पिताजी ख़ुद बेल गाड़ी को तय करते ,दो या तीन रुपया में किराया तय हो जाता ।माँ चुकि गाँव की बहू होती इसलिए बैलगाड़ी के ऊपर एक साड़ी या कपड़े से ढक कर तंबू नुमा बना देते जिसे ओहार कहते थे ,बैलगाड़ी का फ़र्श बांस का होता सो उस पर पुआल रख कर गद्देदार बना दिया जाता ।और सफ़र शुरू हो जाता ,बैल अपनी मस्ती में चलता रहता ना कोई स्पीड पकड़ाने की आतुरता ना धीमे चलने की शिकायत ,सब बैल की कार्यक्षमता पर निर्भर होता ।कच्ची सड़क और बैल गाड़ी के हिचकोले बहुत मज़ा देता मानो कोई आज की ब्रेक डाँस वाली झूला हो जो प्रदर्शनी वाली मेला में लगा होता है ।कभी रात का सफ़र होता तो और भी मज़ा आता ,बैलों की गले की घंटी की आवाज दूसरों के लिए हॉर्न होता लेकिन मुझे तो लोरी की संगीत लगती ,और मैं सो जाता । बेल गाड़ी के नीचे एक लालटेन टंगा होता जिससे रास्ता भी दिख जाता ।उस समय का वही हेड लाइट था इस गाड़ी का ।
अच्छा अपने गाँव की सीमा यानी सिवान (सीमान ) लांघते समय कुछ टोटका भी होता था पाँच मिट्टी के धेला से माथे पर घुमा कर उसे उल्टा फेकना पड़ता ,माँ को ये दादी बताई थी ताकि बाहर की बुरी नज़र गाँव में प्रवेश ना करे ।गाँव में घर पर प्रवेश करते समय सबसे पहले लोटा में पानी लेकर पैर धुलाया जाता ,फिर कुल्ला करवाया जाता ,और भी कुछ कुछ टोटका होता तब जाकर आँगन में प्रवेश होता ,
बैलगाड़ी वाले को उसके किराए के बाद उसे कुछ नस्ता भी करवाया जाता तब कही वापस जाने दिया जाता ।जाते जाते गाड़ी वान कुछ पुआल भी माँग लेता बेल को खिलाने के लिए ।
मुझे गाँव में रहने के बाद पता चला की बैलगाड़ी की भी रजिस्ट्रेशन होता है ,बैलगाड़ी पर विज़िटिंग कार्ड इतना साईंज का टीन का नंबर प्लेट लगा होता है ।शायद उस समय इसका एक साल का रोड टैक्स आठ आना होता था ,लेकिन पकड़े जाने पर जुर्माना एक रुपया था ,सो लोग चेकिंग से डरते भी थे ।रोड इंस्पेक्टर होते थे जो इसे चेक करते थे और वहीं गाँव पर आकर यह नंबर प्लेट दे जाते ।ये मुझे इसलिए भी याद है की वे रोड इंस्पेक्टर मेरे घर पर आए थे मेरे बैलगाड़ी में नम्बर प्लेट लगाने ,बोले नहीं लगायेंगे तो मैं सड़क पर पकड़ूँगा तो जुर्माना देना होगा ।धोती कुर्ता में बड़ी रुआबदार थे वो इंस्पेक्टर ।
उस वक्त बड़ी शान की बात थी उन्नत क़िस्म का बैल रखना और और बैलगाड़ी रखना ।आज की किसी टोयोटा वाली फ़ीलिंग होती थी उस बैल गाड़ी में ……!उस बचपन के भी अनोखे दिन थे ……काश कोई लौटा देता वो दिन ।
©️nitesh
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