रविवार, 27 मार्च 2022

सुनो न

 सुनो !

फाल्गुनी  बयार सी थी 

आज तेरी बातें 

पतझड़ के बाद 

नव कोंपलें खिला रही थी तुम 

पलाश की फूल की तरह 

वीरान में भी दमक रही थी तुम 

स्मृति पर धूल की परत को 

साँसो से उड़ा रही थी तुम 

तेरी गेसुओं की महक से 

आज फिर धड़कने गति पकड़ ली 

अमराइयों में फिर बहका रही थी तुम 

सुनो  न 

तेरी संगीतमय बातों में मुग्ध 

तुझे निहार भी न सका 

कुछ मुझे भी कहना था 

पर कह ना सका 

तुम आज भी हो मेरी 

यही बात 

आज फिर समझ ना सका  

कल फिर मिलोगी तो 

अधूरे बात कर लेंगे हम 

जो तुम मुझसे 

और हम तुमसे  कहना  भूल गए थे 

वो बातें कर लेना तुम 

सुनो 

कल फिर मिल लेना तुम 

@nitesh

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