गुरुवार, 28 मार्च 2019

अरुचिकर है सोनभद्र का राजनीति

अरुचिकर राजनीतिक क्षेत्र है #सोनभद्र:-
सोनभद्र की राजनीति में कोई भी व्यक्ति यहां की जनता या समस्या का प्रतिनिधित्व करने नही आया। स्व0 रामप्यारे पनिका के कार्यकाल तक ही लोग उन्हें अपने सांसद की तरह जानते थे इसके बाद स्थानीय विधयाक  विजय सिंह गौड़ कमोबेस लोगो के हितैषी रहे बाद में वो भी पूंजीपति वर्गों के राजनीतिक शिकार हो गए। यहां जो भी विधायक या सांसद बनने की चाह रखे वो खुद को एक कारपोरेट के सीओ की तर्ज पर ही काम किया, मुनाफा कमाए और लौट गए। मुनाफा कमाने के लिए फिर से चुनाव के दौरान बैनर पोस्टर, पत्रकारों का विज्ञापन और स्थानीय लोगो मे धन वितरण कर चुनाव जीत कर इस अकूत प्राकृतिक संपदा वाली जगह का सीओ ही बनना चाहा, किसी ने इस इस क्षेत्र का भला नही किया। जनप्रतिनिधियों और ब्यूरोक्रेसी के लिए असीमित दोहन  वाला क्षेत्र रहा है सोनभद्र। गांव गिराव का मध्यम चाल का विकसित तस्वीर भी नक्सलियों का देन है। यहाँ का विकास मजबूरी और भय का कारण हो पाया, नक्सलियों के गतिविधियों के डर या उससे जनता को बचाने के लिए कमोबेश विकास का खाँचा पुलिस विभाग ने किया। आज तक किसी भी जनप्रतिनिधियों के पास सोनभद्र के विषय में कोई योजना नही है, स्थानीय लोगो के रोजगार के विषय मे एक शब्द नही है ,बाहरियों के ब्यापार में सब अपनी हिस्से दारी के लिए राजनीतिक पार्टियों की  तख्ती लगा कर घूमते है। स्थानीय आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी पत्थर तोड़ते  जंगल पर ही आश्रित है। मुकम्मल शिक्षा,स्वास्थ्य  उम्मीद तो दूर उनको मिलने वाला निवाला भी छीन लेता है ये आयातित राजनीति कारपोरेट घराना।, स्थानीय आदिवाशी छद्म राजनेतावो के चमचमाती गाड़ी से आज भी भयभीत ही रहते है, अपनी आवाज  भी मजबूत नही करते, इन गाड़ी से निकलने वाला सफेद खद्दर वाले को ही भगवान समझते है ,चाहे कोई दल का हो। उन्हें तो आज तक अपने वोट का महत्व भी नही पता। निरीह की तरह वो आज भी उनसे रोजगार की आस में हाथ फैलाये खड़े है और ये कारपोरेट नेता उनका पत्थर,जंगल जमीन हड़पे जा रहे है। ऐसे लोकसभा या विधानसभा चुनाव कोई खास मायने नही रखता।
राजनीतिक दलों को भी सोनभद्र के जनसमस्याओं से कोई खास  लगाव नही  रहा है, उन्हें तो ऐसा प्रतिनधि चाहिए जो वहां का कारपोरेट का प्रतिनिधित्व करें।इसका मूल कारण यहां का चुनाव क्षेत्र सुरक्षित होना जिसके कारण  प्रतिस्पर्धा कम होना। मिल बांट कर खाने की प्रवृति, कोई स्थानीय जनहितकारी नेता का न होना, छुटभैया नेता से लेकर बड़े नेता प्रशसिंक अधिकारी और पत्रकारों तक को खनन  की अवैध कमाई में हिस्सा तलाशना। ऐसे में जिनके हिस्से  में गरीबो आदिवासियों का भला का जिम्मा है, वो आसानी से धन उगाही में लगे है तो भला कौन करेगा। जो बाहर  से आकर यहां नॉकरी या रोजगार करते है उन्हें भी यहां की इस आरक्षित राजनीत में को दिलचस्पी नही है, उन्हें व्यापारिक लाभ चाहिए और वो भरपूर ले रहे है और बुरे वक्त के लिए अपने राजनीतिक शुभचिंतको को पाल भी रहे है,। गरीब आदिवासियों के लिए तो सोनभद्र आज भी परतंत्र ही लगता है, उन्हें आज भी अपने हितैसी कोई नेता की तलाश है , जो उनका सुने उनके लिए आवाज उठाये, उनके लिए लाठी खाये, उनके दुखो को समझे। उन्हें आज भी अपने नेता का इंतज़ार है।

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