मुझे लगता है भोजुपरी अपनी शालीनता(कुछ फिल्मी अश्लीलता के बावजूद) के कारण देश विदेश के कई कोने में पहुंच गया, और मैथिली स्वम्भू होने की दशा में संवैधानिक मान्यता के बावजूद, अंगिका बज्जिका, में विभक्त हो रहा है, क्षेत्रीयता भी सीमांचल, मिथिलांचल, कोशियांचाल, अंग क्षेत्र, बज्जिका क्षेत्र में बट रहा है, ये स्थिति रही तो कुछ दिनों बाद गिनेचुने लोगो की बोली बनकर रह जायेगी मैथिली। मैथिली में सब को समाहित करने का लय जब तक नही मिलेगा, लोग तबतक इस ओर आकर्षित नही होंगे। साहित्यकार भी अपनी क्षेत्रीयता और जुगाड़ तकनीकी तक ही सिमट रहे है,
गुरुवार, 29 मार्च 2018
बोली
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