बलात्कार और उसका निर्मम हत्या को रोकना किसी कानून या शासन की अकेले वश की बात नही,अन्यथा निर्भया कांड के बाद कठोर कानून और सज़ा के बावजूद इस मे इज़ाफ़ा ही हो रहा है , यह एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक बुराई है इसमें समाज के सभी वर्ग को आगे आकर अपने पुराने संस्कार को संरक्षित करना होगा, एक सामाजिक बहस छेड़नी होगी आधुनिकता और अश्लीलता में अंतर समझना होगा।आज सबसे ज्यादा हिंसा और यौन शोषण करीबियों के द्वारा घटित होती है ,90 प्रतिशत घटना कानून के दरवाजे तक पहुच नही पाती ऐसे में किसी कानून या उसके पालन करने वाले इस तरह की घटनाओं पर पाबंदी नही लगा सकती,दूसरी तरफ कठोर कानून का भय और दुरुपयोग भी सामान्य घटना के बाद बलात्कार और हत्या को उद्वेलित करता है,ऐसे में बदलते रहन सहन और मोबाइल इंटरनेट के युग मे इसे रोक पाना भी असम्भव है, अतःसमाज और समुदाय में एक स्वच्छन्द बहस की जरूरत है,
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