मिथिला मेरी भावनाओ का उपज हो
मेरी संस्कारो की खेती हो
मेरे रोम रोम का स्पंदन हो
मधुर स्वर की स्फुटन से
नित्य नेह का बंधन हो।
तब मैं मैथिल कहलाऊं।
ना कोई लेख पत्र में समझाए
ना उत्सव में बुला मैथिल बनाए,
ना कोई जाति की अहसास कराये
ना कोई सीमा रेखा में मुझे दर्शाये
जब स्वयं पाग पहन इतराऊं
तब मैं मैथिल कहलाऊं।
nice lines
जवाब देंहटाएंसुन्दर पंक्तियाँ
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