मन भटकता है फिर आज पीपल के छाँव में
वही बचपन की पगडंडी वाली गाँव में
मिट्टी की टूटे खपरा से खेल लेते थे कई खेल
कभी गुच्ची तो कभी पिट्ठू
कभी नचा कर तोड़ डालते एक दूसरे की लट्टू
कभी साइकल की पहिया तो कभी मिट्टी की बनाते रेल
भैंस की पीठ बैठ करते हवाई सफ़र
कभी पुआल के टाल में छुपा छुपी का खेल
साँझ होते ही रंग बिरंगी दीयों की रोशनी में
बैठ जाता स्लेट और खल्ली लेकर
बहाने तरह तरह के बनाता
कुछ बड़े बुजुर्गों को देखकर
सवैया ढैया का सवाल सुनकर
कभी नींद तो कभी भूख के बहाने
भाग जाता दालान से घर बुझते दीये के तेल लाने
दिन होते लाल चाय में डुबो कर खा लेता रोटी
थोड़ी देर बाद ही मिलती माड़ भात या मक्के की रोटी
चड्ढी या पेंट का मतलब नहीं जान पाया था
अवसर पाते ही कुआँ या तालाब में खोलकर
नहा लिया था
मिट्टी का घर था उसमें खिड़की के नाम पर था झरोखा
शीशम की चौखट में था भरी भरकम दरवाज़ा
किल्ली अनुपस्थित और उपस्थिति को दर्शाता था
पसीने से लथपथ होने पर घड़े का पानी
किसी एनर्जी ड्रिंक से कम ना था
मिट्टी से खेलना
मिट्टी में लोटना
कहीं चोट मोच या खरोंच होने पर
मिट्टी ही लपेटना
तब किसी इंफेक्शन का डर ना था
तमाम शैतानियों के बीच
सीखनी होती थी गाम घर की संस्कार
आगंतुकों को लौटा भर जल देकर ही
मिल जाता था भरपूर प्यार
जाने कहाँ गुम हो गए
वो पगडंडी वो दीये वो चौखट
वो किल्ली वो खेत खलिहान
वो बैल की गले का रुनझुन
वो सुबह की पराती
वो दादी नानी की कहानी
वो परियों का सपना वो राजा वो रानी
ना जाने नल के आगे
कब सुख गया कुएँ का पानी
जी करता है
फिर से झुका दूँ अपनी माथा खड़ाऊँ वाले पाँव में
मन भटकता है फिर आज पीपल के छाँव में ।
©️nitesh bhardwaj
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