बुधवार, 17 दिसंबर 2025

वो आख़िरी कुछ दिन 2

गतांक से आगे पार्ट 2

मैं बनारस आ गया था ,लेकिन मेरा आना छोटे बेटे को भी अच्छा नहीं लगा कारण जो भी रहा हो,कहता तो ये था कि दिल्ली में इलाज बेहतर होती आपको लौटना नहीं चाहिए था ,बीच वाला भी अपने यहाँ देहरादून बुलाया लेकिन लेने नहीं आया ,उसके यहाँ मेरे लिए समस्यां भी थी कि उसकी नौकरी की व्यस्तता में वो मेरा देखभाल  नहीं कर सकता और अकेले उस पर आर्थिक बोझ भी पड़ता । खैर मैं बनारस में डायलिसिस कराने लगा ,थोड़ा प्यार से थोड़ा खीझकर छोटा वाला सेवा करता रहा ,डायलिसिस करवाता रहा ,अब  आर्थिक समस्या आने लगी ,बड़ा वाला बोला था कि यहाँ से चले जाइएगा तो हर महीने दस हज़ार भेज दूँगा लेकिन उसने दो महीने तक फ़ोन करके भी कुशल क्षेम नहीं पूछा ,बिच वाला भी दो महीने बाद मदद करना बंद कर दिया ।कारण यह था कि मैंने निर्णय लिया कि अगर बड़ा वाला मदद नहीं करता और इन दोनों से संभव हो नहीं पा रहा तो क्यूँ ना गाँव में अपने हिस्से की जमींन बेच दें ।यहाँ बीच वाले को लालच आ गई और कहा कि वो जमीन आपकी नहीं है पुश्तैनी है इसलिए नहीं बेचने दूँगा ..वैग़ैरह वैगेरह …!इस बात से नाराज उसने भी संबंध तोड़ ली ।अब मुझे केवल छोटे वाले बेटे के आश्रय पर जीना था ।तीन महीने बाद फिर मैं दिल्ली गया डॉक्टर से दिखाने ।अकेला सफ़र करना मुश्किल था ,छोटे ने फ़्लाईट पर बिठा दिया ।बड़े वाले को फ़ोन करता रहा लेकिन उसने उठाया नहीं बाद में स्विचऑफ कर दिया ।बीच वाले को मैसेज किया उत्तर आया की मुझे ऑफिस से छुट्टी नहीं मिल रही ।अब मैं दिल्ली महानगर में अकेला लड़खड़ाता भटकने लगा ,ख़ुद के सहारे चला नहीं जाता और भीड़ वाली शहर ।बड़े वाले के व्हाटसप पर मैसेज भेजा तो शाम को कॉल आया कि आप कहाँ है ?मैंने कहा हॉस्पिटल में ,उसका जवाब था फ्री हो जाइएगा तो घर आ जाइएगा । मैं हतप्रभ और लाचार था ,डायलिसिस करवाकर रात को एक बजे फ्री हुआ तो उसके घर पहुंचा लेकिन जाते ही बता दिया कि दूसरे दिन मेरी वापसी की टिकट है ,वे सब राहत भरी सांस ली और दूसरे दिन समय से एयरपोर्ट पहुँचा दिया ।

 खैर अब बनारस में हीं डायलिसिस और दवा करवाता रहा बीच बीच में दिल्ली डॉक्टर से दिखाने जाता रहा ।अब आर्थिक समस्या छोटे वाले पर आ गया ,उसका खीझ बढ़ता जा रहा था कि जब दो बड़ा आपका देखभाल या आर्थिक सहयोग नहीं कर रहा तो मैं ही क्यों करूँ ?उन दोनों को अपने क्या कर लिया ? खैर उसकी ये बात मैं बचपना समझकर नजरंदाज कर देता रहा । ग्यारह महीना  हो  चुका  था  इस  गंभीर समस्या  se गुजरते  हुए ।दो भाई बीच बीच में आर्थिक मदद कर रहे थे लेकिन वो भी काफ़ी नहीं था झेलना छोटे वाले बेटे को ही था ।इस बीच मेरे कुछ शुभचिंतक मेरे मदद में मेरा आर्थिक सहयोग करने लगे ,जद्दोजहद में जिंदगी चलने लगी । हर दूसरे दिन डायलिसिस होनी थी और हर डायलिसिस के लिए इंतज़ाम करना दुर्लभ हो जाता लेकिन ईश्वर को जो मंजूर!

भाइयों ने भी थोड़ी  हाथ खिंचना शुरू कर दिया ,इधर गांव की जमीन बिक नहीं रहा था ,एक एक दाने और दवा का मुहताज होने लगा फिर ….


फिर एक दिन छोटे वाले ने भी जवाब दे लिया ।आप अपना देखे ,अपना कमाता हूँ अपना खाता हूँ अपने ढंग से जियूँगा ,आप अपना देख लीजिए ।

मेरा आख़िरी सहारा भी ख़त्म हो गया ।लेकिन हाँ तब से मैं बहुत मज़बूत हो गया ।चूँकि इस तरह के तिरस्कार की मैं आदि हो गया था ।

अब मैं ख़ुद से गिरते पड़ते डायलिसिस के लिए जाता हूँ ,दवा लेने जाता हूँ ,कोई सड़क पार करवा देता ,कभी गिर जाता हूँ तो कोई उठा देता है ।एक  कप  पानी  भी  ख़ुद  से  लाना  पड़ता  है ।दर्द  से  कराहता  हूँ  लेकिन  ख़ुद  से  करता  हूँ उसे  मेरी  कराह  तक  सुनना  पसंद  नहीं ।जबकि  सभी  को  बारी  बारी  अकेले  पाला  पोशा  हूँ अनाथ  बच्चों  की  तरह ।हाँ  ग़ैर  जो  मुझे  नहीं  जानते  वो  भी कभी कभी कोई दो सहानुभूति के शब्द बोल जाता है ।हाँ  जब कोई  पूछ  देता  है  कि  आपके  साथ  कोई  नहीं  है तब  कहते हुए  आँसू  निकल  जाते  है  कि  सब  था  अब  कोई  नहीं ।कुछ अच्छे कर्म बचे है सो कुछ शुभचिंतक आर्थिक सहयोग कर देते है ईश्वर उन्हें दुनियाँ का सारा ऐश्वर्य दे ।

इतनी लाचारी पर तो अब ख़ुद पर दया आती है ,कभी कभी लाचारी में बुरी तरह गिड़गिड़ाना पड़ता है ,आत्मसम्मान की चिता ना जाने कब की जल चुकी । ईश्वर से यही याचना है कि शीघ्र ही इस शरीर से मुक्ति दिला दें ।मेरे इस हालात पर अपनों के साथ कई योग्य मित्र ,जानने वाले ,या जिनके हम कभी चहेते हुआ करते थे सभी के सभी मुझे अदृश्य कर दिए ।कुशल क्षेम भी पूछना मुनासिब नहीं समझते जबकि किसी से कुछ मांगा नहीं ,जिससे मांगा वो दिया नहीं ।जो दिया वो किसको बताने से मना कर दिया । यही ईश्वर का अनुपम नाटक हो ।

आप शारीरिक पीड़ा सह सकते है लेकिन मानसिक वेदना आपको व्याकुल और विक्षिप्त बना देता है ।आज मैं उसी दौर में हूँ।

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