गुरुवार, 3 मई 2018

मेरी माँ मिथिला

80 साल की बढ़ी माँ आज प्रतिदिन की तरह सुखी लकड़ियों को जला कर थोड़ा चावल और साग बनाने की कोशिश कर रही है, इस से ज्यादा अच्छा भी नही लगता, और बनाने का मन भी नही करता । कौन बर्तन माजेगा ,कौन बाज़ार से तरकारी ला देगा, टूट फूटा कच्चा मकान के देहरी पा बैठी किसी गांव की राहगीर से हरी सब्जी मंगा लेती है, रोज रोज ऐसा करने पर राहगीर उलाहना भी देती है कि बेटे के पास क्यों नही चली जाती और वो मां फिर दर्द भरी लब्जो से कहती है कि यहां कौन देखेगा, बाप दादा की सम्पत्ति , इज़्ज़तऔर मैथिली रीति रिवाज।
दो बेटे और दो बेटियों की बिधवा माँ  बूढ़ी तो है लेकिन जज्बा अब भी जवान है, बाद वाला बेटा दिल्ली में है तो छोटा वाला बंगलोर में इंजीनियर है , बेटी दामाद भी बाहर बड़े शहर में है , कुल सात नाती पोता भी है। सबके शहरों में आलीशान  मकान भी है, बड़ा वाला पांच साल से घर नही आ रहा वो दिल्ली में अपना इवेंट मैनेजमेंट का ब्यापार फैला रखा है तो छोटा इंजीनियर बेटा भी 3 साल से नही आया , पूछने पर बताती है कि उसे नॉकरी से छुट्टी नही मिलती । हाँ बेटी दामाद गर्मी की छुट्टियों में एक साल बाद करके आ जाती है। दोनों बेटे पैसे भी नही भेजते क्योंकि पिता का पेंशन अभी मां को मिलता रहता है, हाँ फोन पर हर सप्ताह कोई  न कोई बेटा फोन करके हाल समाचार ले लेता है, लेकिन किसी बहु पोते पोती को इसके लिए भी फुरसत नही मिलती। अभी पिछले साल बड़े बेटे के 11 साल के बच्चे जब बीमार पड़ था तो यही से पचास हज़ार रुपए भेज था ताकि इलाज़ में कोई कमी न हो। लगभग मिथिला में औसतन हर घर की यही कहानी है, यहां रोजगार का अभाव है सो लगभग सभी जवान बेटा कमाने और उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाते है फिर वही के होकर रह जाते है,वही आलीशान मकान और अपना एक समाज बना लेते है,फिर बच्चो की शिक्षा की दुहाई देते हुए शहर को ही अपना सबकुछ मान लेते है,वही से फेसबुक पर मिथिला और मैथिली का अलख जलाते है,
बूढ़ी माँ भी बताती है कि मेरा बेटा भी मिथिला राज्य का अभियानी है उसे बहुत बड़े बड़े लोग जानते है कई बार वो पटना में मीटिंग करने भी आता है , बड़े बड़े मंच पर अपना बात रखता है ,लोग फूल माला से उसे स्वागत करता है,आगे बढ़ते हुए बोलती है कि जब मिथिला राज्य बन जायेगा तो मेरा बेटा भी बड़ा आदमी बन जायेगा, मेरे यहाँ भी पक्का घर बन जायेगा, तब मेरा बेटा रोज हमसे मिलने आया करेगा, अभी तो पटना आने के बाद भी फुर्सत नही मिलता उसे। बहुत बिजी रहता है, मिथिला के लिए जी जान लगा दिया है। फिर आंखों में आंसू लिए कहती है""मुझसे मिलने नही आता तो क्या? मिथिला में नही आता तो क्या?लेकिन मिथिला के लिए नेता गिरी तो करता है। यही माँ मिथिला का सेवा है, यही मां जानकी की सेवा है, हमतो यहां से रज्जू साह के हाथ मिथिला के पाग और जनेऊ भेज दिए है,कुम्हरौरी बनाये थे वो भी भेजे है ,बेटा  को बहुत अच्छा लगता है"फिर फफक कर रोने लगती है!
©नितेश भारद्वाज

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