गुरुवार, 27 मई 2021

बचपना

 बचपना

 मुझे कोई हक नही था उससे प्रेम करने का, लेकिन उसका एकतरफा प्यार कभी कभी बहुत आकर्षित करता था। उसका चहकना,मचलना बे वजह मेरे करीब आने का  बहाना ढूढना, घण्टो धूप में इंतज़ार करना, और मेरे ही खातिर शिक्षकों से डांट सुनना... इन तमाम हरकतों के बाद कभी कभी तरस तो आती थी लेकिन प्यार नही....

फिर उसने मौका निकाल कर बता ही दिया कि

 "क्या आपको मेरी इतनी मजबूरी नही दिखती?अब क्या चाहते है मर जाऊं तब आपको यकीन होगा कि मैं आपसे प्यार करती हूं.."

..."किसने कहा था प्यार करने को"

..."ये तो कोई बात नही हुई ...मुझे हो गया तो हो गया, अब मैं क्या कर सकती हूं....सच बताऊं मुझे आपको देखे बेगैर चैन नही आता , बस कभी कभार मुझसे बातें कर लिया कीजिये, मुझे आपसे कुछ नही चाहिए बस मुझसे नजरें न फेरा करे ,मुझे एक नजर देख लिया कीजिये।"

...गज़ब पागलपन है...इससे क्या फायदा

.....फायदा नुकसान आप समझे लेकिन मेरी जिंदगी का सवाल है!....आप मुझसे बिल्कुल प्यार न करें लेकिन मुझे जिंदा देखना तो चाहते होंगे ...तो फिर एक नजर देखने मे क्या हर्ज है

 उसकी यह बेकरारी ,पागलपन न चाहते हुए भी कई दिनों तक परेशान करता रहा। अब न चाहते हुए भी उस पर नजर पड़ ही जाती, फिर आहिस्ता आहिस्ता यह एक आदत सा हो गया, जब भी वो आसपास से गुजरती तो मैं भी मुस्कुरा पड़ता। 

संयोग अच्छा था मैं रोजगार के कारण वो शहर छोड़ आया। फिर वो आज का वक़्त नही था जहां संचार माध्यम सांसो के साथ साथ चलती है। हम तो बहुत दूर आ गए थे, वो न जाने कहाँ!!

आज वर्षो बाद सोशल मीडिया पर नाम और शक्ल से मिलती जुलती प्रोफाईल को मित्रता का निवेदन भेज दिया था,  बहुत जल्दी ही स्वीकृति भी मिल गई। मन मे गजब का उत्साह और तूफान सा था, नजरो के सामने वो बेइंतहा प्यार वाली छवि घूमने लगी थी, हाँ आज मन कर रहा था कि बात चलेगी तो दिल खोलकर बात कर लूंगा, प्रेम का कोई दीवार नही होता। प्रेम तो बस प्रेम होता है शर्त बस इतना है कि हृदय में उपजना चाहिए , मन की व्याकुलता में यह फसल जब खूब लहलहाने लगती है तब ही प्रेमी अमीर होने लगता है। मैंने तो कभी उसकी सुंदरता को निहारा ही नही था ,बस उसकी पागलपन को ही देखा था। आज अगर अवसर मिले तो सौंदर्य भी निहार लूंगा उसकी तस्वीर में।  मोबाईल नम्बर का आदानप्रदान हुआ ,और फिर उसकी खनकती स्वर विद्युत  की गति से मन को छूने  लगा।

कैसे है सर??

ठीक हूँ...तुम कैसे हो??

..मैं भी ठीक हूँ, ...इतने दिन बाद..हम याद आये

...नही नही !कोई सम्पर्क सूत्र नही था

...कोई बात नही आप ठीक तो है!

...हाँ बिल्कुल ठीक हूँ, तुम्हारा प्यार जो मेरे साथ है

....हा हा ...मेरा प्यार!

...क्यूँ इसमें मजाक क्या है

.....सर ये तो बिल्कुल ही मजाक है.....आप बचपना के पागलपन को प्यार समझ बैठे। वो नासमझी की एक उदाहरण थी। प्यार तो सोच समझकर किया जाता है।  जीवन की सच्चाई इस प्यार व्यार से बहुत आगे है।खुद में जीना सीखिए सर्, खुद के भरोसे जीने लगेंगे तो दूसरों को जीने की सही नसीहत भी देने लगेंगे। दुसरो की यादों  के भरोसे जीना छोड़ दे ,जो वर्तमान है वही प्यार है।

    शायद वो सच कह रही थी, उसे तो ज्ञान आ गया था, अज्ञानी तो मैं हो गया था। बचपना में तो मैं ही जी रहा था।

©nitesh

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें